बौद्ध धर्म की अवनति तथा पतन
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व समर्थन प्राप्त था। बौद्ध धर्म को ऐसी कोई सहायता व समर्थन प्राप्त नहीं था। तथापि, जो बात अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह है कि ब्राह्मणवाद को राज्य की सहायता व समर्थन तब तक प्राप्त रहा, जब तक इस्लाम एक शांत धर्म के रूप में विकसित नहीं हुआ और उसके अंदर मूर्तिपूजा के विरुद्ध एक लक्ष्य के रूप में प्रारंभ में उन्माद की जो ज्वाला जल रही थी, वह समाप्त नहीं हुई। दूसरी बात यह है कि इस्लाम की तलवार ने बौद्धों के पौरोहित्य को बुरी तरह नष्ट कर दिया और उसे फिर से जीवित नहीं किया जा सका। इसके विपरीत ब्राह्मणवादी पौरोहित्य को मिटाना व नष्ट करना इस्लाम के लिए संभव नहीं हुआ। तीसरी बात यह है कि भारत के ब्राह्मणवादी शासकों ने बौद्ध जनसाधारण पर अत्याचार किए। उनके इस अत्याचार व उत्पीड़न से बचने के लिए भारत के बौद्ध लोगों को बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम को अंगीकर करना पड़ा और उन्होंने बौद्ध धर्म को सदा के लिए छोड़ दिया।
इनमें से कोई भी ऐसा तथ्य नहीं है, जिसकी पुष्टि इतिहास न करता हो।
भारत के जो प्रांत मुस्लिम प्रभुत्व व शासन के अधीन आए थे, उनमें सिंध पहला प्रांत था। इस प्रांत पर पहले एक शूद्र राजा का शासन था। परंतु बाद में उसे एक ब्राह्मण ने अपने राज्य में मिला लिया। वहां उसके वंश का शासन रहा। सन् 712 में जब इब्ने कासिम द्वारा सिंध पर आक्रमण किया गया तो उस समय उसके द्वारा ब्राह्मणवादी धर्म की सहायता करना स्वाभाविक था। सिंध का शासक दाहिर था। इस दाहिर का संबंध ब्राह्मण शासकों के वंश से था।
ह्वेनसांग ने स्वयं अपनी आंखों से यह देखा था कि उसके समय में पंजाब पर एक क्षत्रिय बौद्ध राजवंश का शासन था। इस राजवंश ने पंजाब पर लगभग सन् 880 तक शासन किया। इसके बाद उस राज्य को लल्लिया नामक एक ब्राह्मण सेनाध्यक्ष ने अपने अधीन कर लिया था, जिसने ब्राह्मणशाही राजवंश की स्थापना की। इस वंश ने पंजाब पर सन् 880 से 1021 तक शासन किया। इस प्रकार यह दिखाई पड़ेगा कि जिस समय सुबुक्तगीन तथा मौहम्मद ने पंजाब पर आक्रमण आरंभ किए थे, तब-तब देशी शासक ब्राह्मण धर्मावलंबी थे और जयपाल (960-980 ई.), आनंदपाल (980-1000 ई.) तथा त्रिलोचनपाल (1000-21 ई.) ब्राह्मण धर्मावलंबी शासक थे। सुबुक्तगीन तथा मौहम्मद के साथ इनके संघर्ष के बारे में हमने बहुत पढ़ा है।
मध्य भारत मुस्लिम आक्रमणों से ग्रस्त रहने लगा था। ये आक्रमण मौहम्मद के समय से आरंभ हुए थे और शहाबुद्दीन गौरी के नेतृत्व में जारी रहे। उस समय मध्य भारत में अलग-अलग राज्य थे। मेवाड़ (अब उदयपुर) पर गहलौतों का शासन था, सांभर (अब बूंदी, कोटा तथा सिरोही में विभक्त) पर चौहानों का शासन था, कन्नौज ख्1,
- कन्नौज में कुछ नहीं बचा था। यद्यपि पृथ्वीराज ने बड़ी वीरता से उसकी रक्षा की थी, परंतु मौहम्मद
ने इसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था।