6. ब्राह्मण साहित्य - Page 125

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘विज्ञानवाद’ नामक एक संप्रदाय का प्रवर्तक था। ब्रह्म सूत्र भाष्य में इस विज्ञानवाद की वसुबंधु कृत आलोचना मिलती है। गीता में एक जगह ब्रह्म सूत्र भाष्य का उल्लेख आया है। ख्1, इसलिए गीता की रचना वसुबंधु और ब्रह्मसूत्र भाष्य के बाद ही हुई होगी। वसुबंधु गुप्तवंशीय नरेश बालादित्य का गुरु था। इसी आधार पर पूरी भगवत्गीता का लेखन या कम से कम उसके कुछ अंशों का मूल गीता में जोड़ा जाना निश्चय ही बालादित्य के शासनकाल में या उसके बाद, अर्थात सन् 467 के लगभग हुआ होगा।

यद्यपि भगवत्गीता के रचना-काल के बारे में तो मतभेद पाया जाता है, किंतु इस बारे में किसी तरह का मतभेद नहीं मिलता कि भगवत्गीता के कालांतर में अनेक संस्करण हुए थे। सभी इस बारे में सहमत हैं कि आज हमें भगवत्गीता जिस स्वरूप में उपलब्ध है, वह उसका मूल रूप नहीं है। अलग-अलग समय में अलग-अलग संपादकों के हाथों इसमें क्षेपक जुड़ते रहे हैं। यह भी स्पष्ट है कि जिन-जिन संपादकों के हाथों इसमें रूपांतर होता रहा है, उन सबकी क्षमता समान नहीं थी। प्रो. गार्बे कहते हैं ख्2, ः

गीता निश्चय ही कोई ऐसी कलात्मक कृति नहीं जिसकी रचना किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति ने की हो। इसमें कल्पना की उड़ान तो बहुत बार दिखाई पड़ जाती है, किंतु वह भी कभी-कभी ही। इसमें केवल आडंबरपूर्ण और अर्थहीन शब्दावली के माध्यम से बार-बार किसी एक ही विचार की आवृत्ति दिखाई पड़ती है। कभी-कभी तो साहित्यिक अभिव्यक्तियां भी प्रचुर मात्रा में दोषपूर्ण पाई जाती हैं। अनेक छंद उपनिषदों से ज्यों के त्यों उठाकर रख दिए गए लगते हैं। और यही बात ऐसी है, जिसकी अंतःपे्ररणा से युक्त हर कवि सदा बचना चाहेगा। सत्व, रजस् और तमस् का व्यवस्थित विवेचन पांडित्य प्रदर्शन भर के लिए हुआ है। इनके अतिरिक्त, कई ऐसी बातें और हैं जिनके आधार पर यह सिद्ध किया जा सकता है कि गीता किसी सच्चे और सृजनात्मक कविहृदय की उपज नहीं है....

होपकिन्स का भगवत्गीता के बारे में कथन है कि यह कृति अपनी उदात्तता और अपने बचकानेपन, अपनी तार्किकता और उसके अभाव, दोनों के बारे में विशिष्ट है, अपनी यत्र-तत्र अभिव्यक्ति शक्तिमता और रहस्यात्मक प्रशंसा के बावजूद भगवत्गीता काव्यात्मक कृति की दृष्टि से संतोषजनक नहीं है। एक ही बात को बार-बार दोहराया गया है। आवृत्ति दोष के साथ ही साथ इसमें पदावली और अर्थ में परस्पर विरोध के असंख्य उदाहरण मिलते हैं। इन सब बातों को देखते हुए यदि इसके बारे में यह कहा जाए कि ‘यह एक अद्भुत गीत है जो रोमांचित कर देता है, तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा।

यह कहकर कि यह सब विदेशियों के विचार हैं, इन तथ्यों को झुठलाया नहीं जा

  1. गीता, अध्याय 13, श्लोक 4

  2. वही, पृ. 3