6. ब्राह्मण साहित्य - Page 140

ब्राह्मण साहित्य

125

भोगने के लिए निश्चित है उसे उत्पन्न करते हैं। अकेला ज्ञान इस प्रकार फल नहीं

उत्पन्न कर सकता।

  1. चूंकि (धर्मग्रंथ) ऐसे के लिए (कर्म का) आदेश देते हैं (जिसे वेदों के सार का ज्ञान है)।

‘धर्मग्रंथ उन्हीं के लिए कर्म का आदेश देते हैं, जिन्हें वेदों का ज्ञान है (इसमें) आत्मा का ज्ञान सम्मिलित है। इसलिए केवल ज्ञान से कुछ फल नहीं निकलता।’

  1. और निर्धारित नियमों के कारण

‘यहां कर्म करने के बाद मनुष्य सौ वर्षों तक जीवित रहने की इच्छा करता है।’ (ईषो. 2)। अग्निहोत्र ऐसा यज्ञ-कर्म है, जो वृद्धावस्था और मृत्यु होने तक चलता रहता है, क्योंकि इससे वृद्धावस्था या मृत्यु द्वारा ही मुक्ति होती है (शत. ब्रा. 12.4.1)। इस प्रकार निर्धारित नियमों से भी हमें पता चलता है कि कर्म की तुलना में ज्ञान का स्थान गौण है।

जैमिनि और कर्मकांड शास्त्रों के बारे में बादरायण का क्या दृष्टिकोण है? इसका स्पष्ट परिचय बादरायण के उस उत्तर में मिलता है जो उन्होंने अपने उक्त सूत्रों में वर्णित वेदांत की जैमिनि द्वारा आलोचना किए जाने पर दिया था। यह उत्तर निम्नलिखित सूत्रों में है ख्1, ः

  1. लेकिन चूंकि (धर्मग्रंथ) यह शिक्षा देते हैं कि (आत्मा) (कर्ता से) पृथक होती है, बादरायण का दृष्टिकोण सही है, क्योंकि यही धर्मग्रंथों में मिलता है।

सूत्र 2.7 में मीमांसकों का दृष्टिकोण दिया गया है, जिसका खंडन सूत्र 8.17 में

मिलता है।

वेदांत के सूत्र सीमित आत्मा की शिक्षा नहीं देते, जो कर्ता होती है बल्कि ‘आत्मा’ की शिक्षा देते हैं जो कर्ता से भिन्न होती है। इस प्रकार वेदांत के ग्रंथ जिस ‘आत्मा’ के ज्ञान की बात करते हैं, वह आत्मा के उस ज्ञान से पृथक होता है जो कर्ता के पास होता है। जो ‘आत्मा’ सभी सीमाओं से मुक्त होती है, उसके ज्ञान से सभी कर्मों में सहायता ही नहीं मिलती, बल्कि सभी कर्म समाप्त भी हो जाते हैं। वेदांत के सूत्र इसी ‘आत्मा’ की शिक्षा देते हैं, यह इसके सूत्रों से स्पष्ट है। इनमें यह हैंµयह जो सब कुछ देखता है और सब कुछ जानता है’ (मुंडको. 1.1.9) ‘हे गार्गी, इस अविकारी के प्रबल शासन में आदि (बृहस्पति 3.8.9)।

  1. श्रुति के कथन दोनों दृष्टिकोणों का समान रूप से समर्थन करते हैं।

  2. स्वामी वीरेश्वरानंद, ब्रह्म सूत्र, पृ. 411-16