6. ब्राह्मण साहित्य - Page 139

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. चूंकि (यज्ञादि कर्मों में) (आत्मा) गौण होती है (आत्मा-ज्ञान के फल) केवल कर्ता के गुण बताते हैं, यह अन्य विषयों के संबंध में भी है, ऐसा जैमिनि कहते हैं।

जैमिनि के अनुसार वेद कुछ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, जिसमें मोक्ष की प्राप्ति सम्मिलित है, इससे अधिक कुछ और नहीं, केवल विधियां निर्धारित करते हैं। उनका तर्क है कि आत्मा के विषय में ज्ञान प्राप्त होने से कुछ पृथक परिणाम नहीं प्राप्त होते हैं, जैसा कि वेदांत का मत है, बल्कि उसका संबंध कर्ता के माध्यम से कार्यों से है। जब तक किसी को इस बात का विश्वास न हो कि इसकी सत्ता शरीर से भिन्न है और मृत्यु के बाद वह स्वर्ग जाएगा जहां वह (अपने द्वारा किए गए) यज्ञादि कर्मों के परिणामों का भोग करेगा, कोई भी कोई यज्ञ-कर्म नहीं करता है। आत्मा-ज्ञान से संबंधित ग्रंथों से केवल कर्ता का ज्ञान होता है और इसलिए यह यज्ञादि कर्म के अधीन है। वेदांत के ग्रंथ आत्मा के ज्ञान के संबंध में जिन परिणामों को घोषित करते हैं, वह अन्य विषयों से संबंधित है, चाहे यह ग्रंथ ऐसे परिणामों को गुण के रूप में क्यों न घोषित करते हों। सार रूप में जैमिनि का मत है कि इस ज्ञान से कि उसकी आत्मा शरीर के बाद भी जीवित रहेगी, कर्ता यज्ञ-कर्म करने के लिए सक्षम हो जाता है, जैसे कि शुद्धि संबंधी संस्कार करने से अन्य वस्तुएं यज्ञ-कर्म के बाद सक्षम हो जाती हैं।’

  1. चूंकि (इस प्रकार के धर्मग्रंथों से) हमें (आत्म ज्ञान वाले व्यक्तियों के) आचरण का बोध होता है।

जनक, विदेह के राजा, ने एक यज्ञ किया, जिसमें दानादि मुक्त रूप से दिए गए (बृहस्पति 3.1.1)। ‘अर्थात ऋषियों, मैं एक यज्ञ करूंगा।’ (छान्दोज्ञ 5.11.5)। ये दोनों अर्थात जनक और अश्वपति आत्मा के ज्ञाता थे। अगर आत्मा के इस ज्ञान द्वारा उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया, तब उन्हें यज्ञ करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन उपर्युक्त उदाहरणों से पता चलता है कि उन्होंने यज्ञ किया था। इससे सिद्ध होता है कि किसी को केवल यज्ञ करने से मोक्ष मिल सकता है, न कि आत्मा का ज्ञान होने से, जैसा कि वेदांती लोग कहते हैं।

  1. धर्मग्रंथ प्रत्यक्षतः घोषित करते हैं कि (यज्ञादि कर्मों की तुलना में) आत्मा का ज्ञान होना गौण बात हैः

‘जो ज्ञान, श्रद्धा और ध्यानपूर्वक किया जाता है, वही अधिक तेजस्वी होता है’ (छान्दोज्ञ

1.1.10)। इस पाठ से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान यज्ञ-कर्म का एक अंग है।

  1. चूंकि दोनों (ज्ञान और कर्म) (मृत जीव के साथ फल के लिए) साथ जाते

हैं। ‘इसके बाद ज्ञान, कर्म और विगत अनुभव जाते हैं’ (बृहस्पति 4.4.2)। इस

पाठ से पता चलता है कि जीवात्मा के साथ ज्ञान और कर्म आते हैं और जो फल