6. ब्राह्मण साहित्य - Page 143

128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘धर्मग्रंथों का कहना है कि ज्ञान की प्राप्ति जीवन की उस अवस्था में होती है, जिसमें संयम का पालन निर्धारित होता है, अर्थात चतुर्थ अवस्था या संन्यास आश्रम। संन्यासी के लिए विवेक के अतिरिक्त कुछ भी निर्धारित नहीं है इसलिए, कर्म की अपेक्षा ज्ञान किस प्रकार गौण हो सकता है। हमें धर्मग्रंथों में ही जीवन की ऐसी अवस्था का उल्लेख मिलता है जिसे संन्यास कहते हैं, जैसे कर्तव्य की तीन शाखाएं हैं। पहली है त्याग, अध्ययन और सद्भाव... ये तीनों शाखाएं सद्गुण के संसार को प्राप्त करती हैं, लेकिन केवल उसी को अमरता प्राप्त होती है, जो ब्राह्मण में पूर्व तीन हैं (छान्दो. 2.33.1-2)। ‘इस संसार (आत्मा) की इच्छा से ही भिक्षु अपने-अपने घरों को त्याग देते हैं।’ (बृ. 4.4.22), मुड़ 1.2.111 और छान्दो. 5.10.1 भी देखिए। प्रत्येक व्यक्ति गृही हुए बिना इस जीवन को अपना सकता है, जिससे ज्ञान की स्वतंत्र स्थिति का पता चलता है।’

बादरायण के सूत्रों में अनेक ऐसे सूत्र हैं, जिनमें इन दोनों संप्रदायों के एक-दूसरे के प्रति विचारों का परिचय मिल सकता है। किंतु यहां एक ही पर्याप्त है क्योंकि यह उदाहरण के रूप में प्रतीक बन गया है। अगर कोई किसी बात पर तर्क करना बंद कर देता है, तब स्थिति बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। जैमिनि वेदांत की निंदा उसे एक झूठा शास्त्र, धोखाधड़ी, बहुत कुछ सतही, अनावश्यक और तत्वहीन कह कर करते हैं। इस प्रकार की आलोचना होती देख बादरायण क्या करते हैं? वह अपने ही वेदांत शास्त्र की पुष्टि करते हैं। बादरायण से किसी ने यही अपेक्षा की होगी कि वह जैमिनि के कर्मकांड की निंदा उसे एक झूठा धर्म कह कर करते। बादरायण ऐसा कोई साहस नहीं करते। उल्टे, वह बहुत ही नम्र हैं। वह यह स्वीकार कर लेते हैं कि जैमिनि का कर्मकांड धर्मग्रंथों पर आधारित है और उसका खंडन नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर वह इस बात पर जोर देते हैं कि उनके वेदांत का सिद्धांत भी सही है, क्योंकि इसे भी धर्मग्रंथों का समर्थन प्राप्त है। बादरायण के इस रवैये के बारे में कुछ स्पष्टकिरण आवश्यक है।

भगवत्गीता

भगवत्गीता, महाभारत नामक महाकाव्य के भीष्म पर्व का अंग है। यह महाकाव्य मुख्यतः चचेरे भाइयों, धृतराष्ट्र-पुत्र कौरवों और पांडु-पुत्र पांडवों के बीच प्रभुसत्ता के संबंध में परस्पर संघर्ष से संबंधित है। पांडु, धृतराष्ट्र का अनुज था। धृतराष्ट्र के अंधे होने की वजह से राजसिंहासन पर पांडु बैठा। पांडु की असामयिक मृत्यु के पश्चात पांडवों और धृतराष्ट्र-पुत्र कौरवों के बीच राजसिंहासन के उत्तराधिकार के प्रश्न पर कलह शुरू हो गया। इस संघर्ष की चरम परिणति कुरुक्षेत्र (आधुनिक पानीपत के पास) के युद्ध के रूप में हुई। इस युद्ध में कृष्ण ने पांडवों का साथ दिया और वह उनका पथप्रदर्शक, मित्र और दार्शनिक, तीनों ही था। लेकिन वह पांडवों में से उनके भाई अर्जुन का सारथी, अर्थात रथ-चालक बना।