6. ब्राह्मण साहित्य - Page 144

ब्राह्मण साहित्य

129

कौरवों और पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तैयार खड़ी हैं। सारथी के रूप में कृष्ण के साथ अर्जुन रथ में आरूढ़ होकर युद्ध के मैदान में आते हैं और पांडव सेना के अग्र भाग में अपना स्थान ग्रहण करते हैं। युद्ध की कामना के लिए वह शूरवीर अपनी विपक्षी कौरव सेना को निहारता है, तो उसे चारों ओर अपना ही कुल, अपने ही बंधु-बांधव, अपने ही गुरुजन दिखाई पड़ते हैं। स्वजनों के साथ होने वाले इस भयानक युद्ध में उसे अपने ही भाइयों-भतीजों, अपने ही गुरुजनों, अपने ही स्नेहियों, अपने ही श्रद्धेयों, आदि का रक्तपात करना पड़ेगा, इस विचार के आते ही वह युद्ध की भयानकता के परिणाम से भय-ग्रस्त हो जाता है। उसके मन में विषाद उत्पन्न होता है और वह अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग कर युद्ध से मना कर देता है। कृष्ण उसके साथ तर्क-वितर्क करते हैं और उसे युद्ध करने के लिए उकसाते हैं। अर्जुन और कृष्ण के बीच का यही वाद-विवाद प्रश्नोत्तर रूप में गीता है। कृष्णार्जुन-संवाद के परिणामस्वरूप अंत में अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार हो जाता है।

भगवत्गीता का आरंभ वृद्ध धृतराष्ट्र और संजय के बीच युद्ध करने के बारे में बातचीत से होता है। कौरवों का पिता धृतराष्ट्र युद्ध-काल में जीवित होते हुए भी अंधा होने की वजह से स्वयं कुछ नहीं देख सकता। युद्ध-भूमि में क्या-क्या हो रहा है, यह जानने के लिए वह दूसरे पर आश्रित है। धृतराष्ट्र को युद्ध-भूमि का आंखों देखा हाल कौन सुनाएगा, इस कठिनाई का पूर्वाभास होने पर कहते हैं कि महाभारतकार व्यास ने धृतराष्ट्र का रथ हांकने वाले संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की ताकि वह युद्ध-क्षेत्र में होने वाली प्रत्येक घटना को, घटना ही नहीं मनुष्य के मन में उठने वाले सभी विचारों को जान ले और उन्हें ज्यों-का-त्यों धृतराष्ट्र को सुना दे। इसलिए भगवत्गीता की कथा मुख्यतः धृतराष्ट्र और संजय के बीच हुए प्रश्नोत्तरों के रूप में है। किन्तु गीता वस्तुतः अर्जुन और कृष्ण के बीच हुई बातचीत से संबंधित है। इसलिए तो इसे ‘कृष्णार्जुन संवाद’ कहा गया है, जो उचित जान पड़ता है।

इस कृष्णार्जुन संवाद में, जो भगवत्गीता का वास्तविक नाम है, विवाद का मुख्य विषय यह है कि युद्ध किया जाए या नहीं। विवाद का और कोई प्रश्न नहीं है। केवल इसी विषय पर दोनों में वाद-विवाद होता है। केवल इसी दृष्टिकोण से विचार करें तो स्पष्ट है कि तब यह अवसर नहीं था कि कृष्ण सामान्य जनता को नैतिक उपदेश दे या कि वह अपनी किसी धार्मिक मान्यता का प्रतिपादन करे अथवा किसी पंथ विशेष की प्रश्नोत्तरी शैली का सहारा ले। किंतु गीता में यही बात तो उभरकर सामने आती है। अर्जुन का प्रश्न था, युद्ध करूं या नहीं? कृष्ण का उत्तर हां या न में आना चाहिए था, किंतु कहते हैं, गीता में तो कृष्ण ने अर्जुन को अपना सारा-का-सारा धर्म संदेश ही सुना दिया।