7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 174

ब्राह्मणवाद की विजय

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ऐसा लगता है कि मूल पद्धति का उद्देश्य प्रौढ़ व्यक्तियों के वर्ण का निर्धारण करना था। यह किसी पूर्ण प्रशिक्षण या प्रवृत्ति और अभिरुचि के सूक्ष्म परीक्षण पर आधारित नहीं थी। मनु और सप्तर्षि एक प्रकार का चयन मंडल था, जो साक्षात्कार के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के वर्ण का निर्धारण करता था। वर्ण का निर्धारण अनियमित रीति से होता था। ऐसा लगता है कि यह पद्धति व्यवहार में नहीं रही। इसके स्थान पर एक पद्धति शुरू हुई। इसे गुरुकुल-पद्धति कहा जाता था। गुरुकुल एक प्रकार का विद्यालय होता था। इसका भार एक गुरु पर होता था, जिसे आचार्य भी कहते थे। सभी बच्चे इसी गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते थे। शिक्षा की अवधि बारह वर्ष होती थी। जब तक कोई बालक गुरुकुल में रहता था, वह ब्रह्मचारी कहलाता था। जब शिक्षा की अवधि पूरी हो जाती, तब उसके बाद अत्यंत महत्वपूर्ण उपनयन समारोह होता था। यही वह समारोह होता था, जिसमें आचार्य प्रत्येक विद्यार्थी का वर्ण निश्चित करते थे और उसे संसार में अपने वर्ण के कर्तव्य को पूरा करने के लिए वापस भेज देते थे। आचार्य द्वारा उपनयन वर्ण को निश्चित करने का नया तरीका था, जो मनु और सप्तर्षि द्वारा निर्धारण करने की पद्धति के स्थान पर प्रचलित हुआ। यह नई प्रणाली पुरानी प्रणाली की तुलना में निस्संदेह श्रेष्ठ थी। इसमें पुरानी प्रणाली का वास्तविक तत्व निहित था, अर्थात् वर्ण का निर्धारण तटस्थ और स्वतंत्र सत्ता द्वारा किया जाना चाहिए। लेकिन इसमें एक नया तत्व आया, अर्थात् वर्ण के निर्धारण के लिए पूर्व-प्रशिक्षण आवश्यक हो गया। इसका कारण यह है कि प्रशिक्षण ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करता है और किसी भी व्यक्ति के वर्ण का निर्धारण करने का सबसे निरापद उपाय उसके व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त करना है। इस नए तत्व के समावेश से निस्संदेह बहुत सुधार हुआ।

आचार्य वाली गुरुकुल प्रणाली के शुरू होने से वर्ण की अवधि में परिवर्तन हुआ। कोई वर्ण किसी अवधि तक रहने के बजाए, जीवन-पर्यन्त हो गया। लेकिन यह वंशानुगत नहीं था।

स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद उस पद्धति से असंतुष्ट था। इस पद्धति के अधीन इस बात की पूरी संभावना बनी रहती थी कि आचार्य ब्राह्मण के बालक को केवल शूद्र होने के योग्य घोषित कर दे। स्वाभाविक है कि ब्राह्मणवाद इस परिणाम की संभावना को दूर करने के बारे में अधिक चिंतित था। वह वर्ण को वंशानुगत बनाना चाहता था। वह वर्ण को वंशानुगत बनाकर ही ब्राह्मण के बालक को शूद्र घोषित किए जाने से बचा सकता था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए ब्राह्मणवाद ने जितनी ढिठाई के साथ कोशिश की, उसकी कल्पना शायद असंभव है।

  1. मनु का यह कथन है कि शूद्रों को वेदों का पाठ नहीं करना चाहिए और न उन्हें सुनना चाहिए। इस

कथन के संदर्भ में यह कहना कि वेदों में कुछ शब्द शूद्रों द्वारा विरचित हैं, एक गूढ़ प्रश्न है। इस प्रश्न

का समाधान इसी सिद्धांत से हो सकता है।