7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 173

158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तीन अवस्थाएं हैं। इस परंपरा को कुछ इस प्रकार समझने का कोई कारण नहीं है कि यह वास्तविक स्थिति की प्रतीक न हो। इस परंपरा के अनुसार किसी भ्ी व्यक्ति के वर्ण का निश्चय करने का काम अधिकारियों के एक दल द्वारा किया जाता था, जिन्हें मनु और सप्तर्षि कहते थे। व्यक्ति के समूह में से मनु उनका चुनाव करता था, जो क्षत्रिय और वैश्य होने के योग्य होते थे और सप्तर्षि उन व्यक्तियों को चुनते थे जो ब्राह्मण होने के योग्य होते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने के लिए मनु और सप्तर्षियों द्वारा व्यक्तियों का चुनाव करने के बाद बाकी व्यक्ति जो नहीं चुनने जा सकते थे, वे शूद्र कहलाते थे। इस प्रकार जो वर्ण-व्यवस्था निश्चित की जाती थी, वह एक युग, अर्थात् चार वर्ष की अवधि तक रहती थी। हर चौथे वर्ष अधिकारियों का नया दल नयाचुनाव करने के लिए नियुक्त होता था। जिसकी पद संज्ञा, वही मनु और सप्तर्षि, होती थी। इस प्रक्रिया में यह होता था कि जो लोग पिछली बार केवल शूद्र होने के योग्य बच जाते थे, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुन लिए जाते थे, जबकि पिछली बार जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुने गए थे, वे केवल शूद्र होने के योग्य होने के कारण रह जाते थे। इस प्रकार वर्ण के व्यक्ति बदलते रहते थे। यह एक प्रकार से निश्चित अवधि पर होने वाला परिवर्तन था। जैसे ताश के पत्ते हर बाजी के बाद फेंट दिए जाते हैं, और व्यक्तियों का चुनाव उनकी मानसिक और शारीरिक अभिरुचि और व्यवसायों के आधार पर होता था, जो समाज के जीवन के लिए अनिवार्य होते थे। जिस काल में वर्णों में व्यक्तियों की अदला-बदली होती थी, उसे ‘मन्वन्तर’ कहते थे। इस शब्द का अर्थ वह अवधि भी है, जिसके लिए किसी व्यक्ति को वर्ण निश्चित किया जाता था। व्युत्पत्ति की दृष्टि से इसका अर्थ मनु द्वारा किया गया वर्ण-व्यवस्था के आवश्यक तत्वों को अभिव्यक्त करता है, ये दो तत्व थे। पहला यह कि वर्ण का निश्चय लोगों की एक स्वतंत्र सत्ता के द्वारा किया जाता था, जिसे मनु और सप्तर्षि कहते थे। दूसरा यह कि अमूक वर्ण किसी अवधि का था, जिसके बाद मनु द्वारा परिवर्तन किया जाता था ख्2, पुराणों में वर्णित प्राचीन परंपरा के अनुसार जितनी अवधि के लिए किसी भी व्यक्ति का वर्ण मनु और सप्तर्षि द्वारा निश्चित किया जाता था, वह चार वर्ष की होती थी और उसे युग कहते थे। चार वर्ष की अवधि की समाप्ति पर मन्वन्तर होता था जिसके द्वारा हर चार वर्ष बाद सूची में संशोधन कर दिया जाता था। इस संशोधन के अधीन कुछ का पिछला वर्ण बदल जाता था, कुछ का बना रहता था, कुछ अपने वर्ण को गंवा देते थे और कुछ को लाभ हो जाता था। ख्1,

  1. मैं यहां श्री दफतरी और प्रज्ञानेश्वर यति के शोध में प्राप्त विवरण को अपने लेख में अपना आधार बना

रहा हूं। श्री दफतरी की धर्म रहस्य और श्री यति की चातुर्वर्ण्य नामक पुस्तक में उनके दृष्टिकोण सर्वथा

मौलिक हैं, अतः ये बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। उन्होंने जो रूपरेखा दी है, उसके आधार पर निस्संदेह

आगे अनुसंधान किया जाना चाहिए।

  1. इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि सुमति भार्गव ने अपनी संहिता का नाम मनुस्मृति क्यों रखा। इससे

वह मनु को आदृत और प्राधिकृत करना चाहता था।