ब्राह्मणवाद की विजय
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बौद्ध धर्म पर विजय प्राप्त करने के बाद ब्राह्मणवाद ने जो कार्य किए, उस सूची में से अब तीसरे कार्य पर विचार किया जाए। यह कार्य ब्राह्मणों को गैर-ब्राह्मणों के प्रभाव से अगल करना और गैर-ब्राह्मणों को विभिन्न सामाजिक स्तरों में बांटना था।
पुष्यमित्र की ब्राह्मण क्रांति का उद्देश्य चातुर्वर्ण्य की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था का उद्धार करना था, जिसे बौद्ध शासन में काल की कसौटी पर परखा जा रहा था। लेकिन जब बौद्ध धर्म पर ब्राह्मणवाद ने विजय प्राप्त कर ली, तब उसे चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था को उसी रूप में, जिस रूप में वह पहले थी, पुनः स्थापित करने पर भी संतोष नहीं हुआ। बौद्ध पूर्व समय में चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था एक उदार व्यवस्था थी और उसमें गुंजाइश थी। इसका कारण यह है कि इसका विवाह व्यवस्था से कोई संबंध नहीं था। चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था में जहां चार विभिन्न वर्गों के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था, वहां इन वर्गों में आपस में विवाह-संबंध करने पर कोई निषेध नहीं था। किसी भी वर्ण का पुरुष विधिपूर्वक दूसरे वर्ण की स्त्री के साथ विवाह कर सकता था। उस दृष्टिकोण की पुष्टि में अनेक दृष्टांत उपलब्ध हैं। मैं नीचे कुछ दृष्टांत दे रहा हूं, जो ऐसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हैं, जिन्हें हिंदुओं की पवित्र भाषाओं में काफी यश प्राप्त हैः
पति वर्ण पत्नी वर्ण
शांतनु क्षत्रिय गंगा शूद्र अनामिका
शांतनु क्षत्रिय मत्स्यगंधा शूद्र धींवर स्त्री
पाराशर ब्राह्मण मत्स्यगंधा शूद्र धींवर स्त्री
विश्वामित्र क्षत्रिय मेनका अप्सरा
ययाति क्षत्रिय देवयानी ब्राह्मण
ययाति क्षत्रिय शर्मिष्ठा आसुरी-अनार्य
जरत्कारू ब्राह्मण जरत्कारि नाग-अनार्य
जिस किसी को इस बारे में शंका हो कि विभिन्न वर्गों में समाज के विभाजन में इन चार वर्णों में परस्पर अन्तर्विवाह का कोई निषेध नहीं था, उससे मेरा आग्रह है कि वह महान ब्राह्मण ऋषि व्यास के परिवार की वंशावली पर ध्यान देने की कृपा करें, जो नीचे दी गई हैµ