ब्राह्मणवाद की विजय
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श्री काणे ख्1, ने सती-प्रथा का स्पष्टीकरण देने का उद्यम किया है। उनका कहना है कि इसमें कोई नई बात नहीं है। यह प्राचीन-काल में भारत में भी थी, जैसी कि विश्व के अन्य भागों में थी। इससे दुनिया को संतोष नहीं है। यदि यह भरत के बाहर थी तो वहां यह उतने बड़े पैमाने पर नहीं होती थी, जितनी कि यह भारत में होती थी। दूसरे, अगर इसके चिर्िं प्राचीन भारत में क्षत्रियों में पाए जाते थे तो इसे फिर से क्यों शुरू किया गया। इसे विश्वव्यापी क्यों नहीं बनाया गया? इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है। श्री काणे का यह कहना कि यह उत्तराधिकार संबंधी नियमों के प्रसंग में प्रचलित थी, मुझे कोई बहुत अधिक संतोषप्रद नहीं लगती। इसका कारण यह हो सकता है कि उत्तराधिकार के बारे में हिंदू कानून के तहत स्त्री संपत्ति में एक भाग की अधिकारी होती थी, जैसा कि बंगाल में होता था। पति के संबंधी विधवा पर सती हो जाने के लिए दबाव डालते थे, जिससे कि वह उस भाग के संबंध में मुक्त हो सकें। शायद यह एक कारण हो जिससे बंगाल में इतने बड़े पैमाने पर सती-प्रथा का प्रचलन रहा। लेकिन इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि यह किस प्रकार शुरू हुई और यह किस प्रकार भारत के अन्य भागों में व्यवहार में लाई जाने लगी।
इसके अलावा विधवाओं के पुनर्विवाह पर निषेध के कारणों का कुछ भी पता नहीं चलता। विधवा-विवाह की प्रथा के प्रचलित होते हुए भी विधवा को विवाह करने से क्यों वर्जित किया गया? उससे कष्टपूर्ण जीवन बिताने की अपेक्षा की गई। उसे विरूप क्यों किया गया?
लड़कियों के विवाह, आरोपित वैधव्य और सती-प्रथा के बारे में मेरा मत सर्वथा विपरीत है। मैं इसकी प्रामाणिकता या महत्व के बारे में कोई दावा न करते हुए इसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं ख्2, ः
‘इस प्रकार बहिर्जातीय विवाह पद्धति के स्थान पर सजातीय विवाह पद्धति के आरंभ का अर्थ है, जातिप्रथा का सृजन। लेकिन यह कोई सरल कार्य नहीं है। आइए, हम कोई काल्पनिक वर्ग लें जो जाति बनाना चाहता है और इस बात का विश्लेषण करें कि इस वर्ग को सजातीय विवाह पद्धति का बनाने के लिए कौन से उपाय अपनाने होंगे। यदि यह वर्ग जाति बनना चाहता है, तब बाहर के वर्गों के साथ सजातीय विवाह पर औपचारिक निषेधाज्ञा से कोई प्रयोजन नहीं पूरा होगा, विशेषकर ऐसी स्थिति में जब अंतर्जातीय विवाह पद्धति आरंभ करने से पूर्व सभी वैवाहिक संबंधों के लिए बहिर्जातीय विवाह पद्धति नियम होती थी। इसके अलावा, जो वर्ग एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ संपर्कपूर्वक
हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र
यह ‘कास्ट्स इन इंडिया’ नामक मेरे लेख में मिलेंगे जो इंडियन एंटीक्वैरी नामक पत्रिका में मई, 1917
के अंक में प्रकाशित हुआ था।