7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 183

168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पूर्व ब्राह्मणवाद में विवाह ऋतुमती होने के बाद ही नहीं किए जाते थे, बल्कि तब किए जाते थे जब लड़कियों की इतनी आयु हो जाती थी कि उन्हें वयस्क कहा जा सके। इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। इसी प्रकार यह नियम भी नया है कि स्त्री को एक बार अपने पति के दिवंगत हो जाने पर दूसरा विवाह नहीं करना चाहिए। बौद्ध पूर्व ब्राह्मणवाद ख्1, में विधवा के पुनर्विवाह पर कोई रोक नहीं थी। संस्कृत भाषा में ‘पुनर्भू’ (अर्थात् वह स्त्री जिसका दूसरा विवाह हुआ हो) और ‘पुनर्भव’ (अर्थात् दूसरा पति) जैसे शब्द मिलते हैं। इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि बौद्ध पूर्व ब्राह्मणवाद में इस प्रकार के विवाह एक आम बात थी। ख्2, सती के बारे में कि यह प्रथा कब शुरू हुई है ख्3,, इस बात का भी साक्ष्य है कि यह प्राचीन काल में होती थी। लेकिन इस बात का भी साक्ष्य है कि यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो गई और बौद्ध धर्म पर पुष्यमित्र के अधीन ब्राह्मणवाद की विजय के बाद फिर से शुरू की गई, हालांकि यह लगभग मनु के बाद ही हुआ होगा।

प्रश्न यह है कि यह परिवर्तन विजयी ब्राह्मणवाद ने क्यों किए? ब्राह्मणवाद लड़कियों का विवाह उनके ऋतुमती होने के पहले ही कर, विधवाओं को पुनर्विवाह के अधिकार का निषेध कर, और उन्हें अपने दिवंगत पति की चिता पर आत्मदाह करने का निर्देश देकर कौन-सा उद्देश्य पूरा करना चाहता था? इन परिवर्तनों के कारणों का कुछ भी पता नहीं चलता। श्री सी.वी. वैद्य, जो लड़कियों के विवाह के बारे में स्पष्टीकरण देते हैं, कहते हैं ख्4, कि लड़कियों का विवाह उनको बौद्ध धर्म में भिक्षुणी बनने से रोकने के लिए शुरू किया गया। मैं इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हूं। श्री वैद्य मनु द्वारा निर्धारित एक अन्य नियम, अर्थात् विवाह के लिए उपयुक्त आयु से संबंधित नियम पर विचार करने से चूक जाते हैं। इस नियम के अनुसारः

9.94. तीस वर्ष की आयु का व्यक्ति बारह वर्ष की आयु की कुमारी से विवाह

करे जो उसको प्रसन्न रखेगी या चौबीस वर्ष की आयु का व्यक्ति आठ वर्ष की

आयु की लड़की के साथ।

प्रश्न यह नहीं है कि बाल-विवाह को क्यों आरंभ किया गया। प्रश्न यह है कि मनु ने वर और कन्या की आयु में इतने अधिक अंतर की क्यों अनुमति दी?

  1. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, काणे, खण्डµ1

  2. वही, काणे, खंड 2, भाग 2

  3. सती प्रथा के बारे में उपलब्ध प्रमाण श्री काणे ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र में संग्रहीत किए

हैं, खंड 2, भागµ1, पृ. 617-36

  1. हिस्ट्री ऑफ इंडिया, खण्ड-2