ब्राह्मणवाद की विजय
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जिसे संस्कृत में गृहस्थ (जो विवाह कर अपना परिवार बना सके) कहते हैं, रखना जाति के हित में है। लेकिन यहां समस्या उसे उसी जाति की पत्नी की व्यवस्था करने की है। शुरू में यह संभव नहीं हो सका, क्योंकि तब जाति में अनुपात एक पुरुष के लिए एक स्त्री का होगा और किसी को दोबारा विवाह करने का अवसर नहीं मिल सकता। इसका कारण यह है कि जाति स्वतः आत्मकेंद्रित होती है, उसमें विवाह-योग्य पुरुषों के लिए विवाह-योग्य स्त्रियां पर्याप्त मात्रा में होती हैं। इन परिस्थितियों में अतिरिक्त पुरुष के लिए वधू की व्यवस्था उन लड़कियों में से की जा सकती है जो विवाह-योग्य अभी नहीं हुई हैं, जिससे वह व्यक्ति उस वर्ग से जुड़ा रहे। अतिरिक्त पुरुष के मामले में निश्चित ही यही यथासंभव श्रेष्ठ समाधान है। ऐसा करने से उसे जाति में ही रखा जा सकता है। ऐसा करने से उस जाति को छोड़कर निरंतर बाहर आने वाली जनसंख्या पर नियंत्रण रखा जा सकता है और ऐसा करने से सजातीय विवाह व्यवस्था और आदर्श सुरक्षित रखे जा सकते हैं।य्
फ्इस प्रकार हम देखते हैं कि जिन उपायों द्वारा स्त्री-पुरुषों के बीच संख्यात्मक विषमता को नियंत्रित रखा जा सकता है - वे चार हैं, (1) दिवंगत पति के साथ उसकी विधवा का अग्निदाह, (2) अनिवार्य वैधव्य अग्निदाह का हल्का रूप, (3) विधुर पर अनिवार्य ब्रह्मचारी का जीवन आरोपित करना, और (4) उसका विवाह ऐसी लड़की से कर देना जो विवाह योग्य न हो। जैसा मैं कह चुका हूं कि विधवा का अग्निदाह और विधुर का अनिवार्य ब्रह्मचारी का जीवन आरोपित करना, ये दोनों उपाय ऐसे हैं जिनके किसी समुदाय में सजातीय विवाह व्यवस्था बनाए रखने में कार्यान्वित होने में संदेह है, ये दोनों उपाय मात्र हैं। लेकिन जब यह उपाय कठोरतापूर्वक कार्यान्वित किए जाते हैं तब लक्ष्य पूरा हो जाता है। ये उपाय कौन-सा लक्ष्य पूरा करते हैं? ये सजातीय विवाह व्यवस्था का सृजन और उसे स्थाई बनाते हैं। जाति की विभिन्न परिभाषाओं में हमारे विश्लेषण के अनुसार जाति और सजातीय विवाह व्यवस्था, दोनों एक ही वस्तु हैं। इस प्रकार इन उपायों का प्रयोजन जाति और जाति-व्यवस्था में ये दोनों ही उपाय निहित हैं।य्
फ्मेरे विचार में किसी भी जाति-व्यवस्था में जाति का यही सामान्य रूप होता है। आइए, अब हिंदू समाज की जातियों और उनकी व्यवस्था पर विचार करें। हम सभी जानते हैं कि भारत में जाति एक अत्यंत प्राचीन व्यवस्था है, और यह कि जो लोग अतीत को उद्घाटित करना चाहते हैं, उनके रास्तों में बहुत सी कठिनाइयां आती हैं। यह बात वहां के लिए तो और भी सच होती है, जहां न तो कोई प्रमाणिक या लिखित इतिहास होता है, और न ही कोई अभिलेख होते हैं, या जहां लोग इस प्रकार संगठित रहते हैं, जैसे हिंदू, जिनके लिए इतिहास लिखना इसलिए महत्वपूर्ण कार्य है कि यह सारा विश्व ही मिथ्या है। फिर भी व्यवस्थाएं तो रहती हैं, चाहे चिरकाल तक इनका