7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 189

174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इतिहास अलिखित ही क्यों न रह जाए और इनके थोड़े-बहुत आचार-विचार और नैतिक आदर्श जीवाश्व की तरह हैं, जो अपना इतिहास कहते हैं। अगर यह सच है और अगर हम इसका विश्लेषण करें कि हिंदुओं ने इस अतिरिक्त पुरुष और स्त्री की समस्या का किस प्रकार समाधान किया, तो हम काफी सफल हो सकते हैं।

हिंदू समाज की कार्यप्रणाली में, जो यद्यपि बहुत ही जटिल रही है, पत्नियों के संबंध में मोटे तौर पर तीन रीतियां मिलती हैं, जो किसी और समाज में नहीं मिलतीं। ये निम्नलिखित हैंः

(1) सती अर्थात् विधवा को उसके दिवंगत पति के शव के साथ चिता में जला

देना,

(2) अनिवार्य वैधव्य जिसके द्वारा किसी भी विधवा को पुनर्विवाह की अनुमति

नहीं है, और

(3) बाल्यावस्था में विवाह।

इसके अलावा, अधिकांश विधुर व्यक्तियों में संन्यास लेने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है, जो कुछ मामलों में केवल मानसिक झुकाव के कारण हो सकती है। फ्जहां तक मैं जानता हूं, इन प्रथाओं की उत्पत्ति का कोई वैज्ञानिक कारण आज तक नहीं मिल पाया है। इस बारे में हमें पर्याप्त चिंतन सामग्री उपलब्ध है कि इन प्रथाओं में लोगों की श्रद्धा क्यों थी? (तुलना कीजिएः ब्रिटिश सोशियोलॉजिकल रिव्यू, वॉल्यूम 6, 1953 में ए.के. कुमारस्वामी - सतीः ए डिफेंस ऑफ दि ईस्टर्न वीमेन) चूंकि यह शरीर और आत्मा, पति और पत्नी की पूर्ण एकता और कब्र के बाद भी निष्ठा का प्रमाण है, चूंकि यह स्त्रीत्व के आदर्श का प्रतीक है जिसे उमा ने बड़े अच्छे ढंग से व्यक्त किया है, जब वह कहती हैः ‘अपने पति के प्रति निष्ठा स्त्री का गौरव है, वह उसका शाश्वत स्वर्ग है।’ वह मानवों की भांति बड़ा आर्तनाद करते हुए कहती है, ‘हे महेश्वर, यदि आप मुझसे संतुष्ट नहीं हैं, तो मैं स्वर्ग भी नहीं चाहती।’ मैं यह नहीं जानती कि अनिवार्य वैधव्य को क्यों गौरव दिया जाता है, हालांकि बहुत से लोग अनिवार्य वैधव्य का समर्थन करते हैं। लेकिन मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसने इसकी प्रशंसा की हो। छोटी उम्र में ही लड़कियों का विवाह कर देने की प्रथा की प्रशंसा में डॉ. केतकर ने बताया है, जो इस प्रकार है - ‘जो पुरुष या स्त्री वास्तविक रूप से निष्ठावान है, उसे अपनी पत्नी या पति के अतिरिक्त, जिसके साथ उसका विवाह हो गया है, किसी भी दूसरी स्त्री या पुरुष के प्रति अनुरक्त नहीं होना चाहिए। यह शुचिता न केवल विवाह के बाद, बल्कि विवाह के पहले भी अनिवार्य है क्योंकि यही ब्रह्मचर्य का सच्चा आदर्श है। अगर कोई कुमारी उस व्यक्ति, जिसके साथ उसका विवाह होगा, के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम-भाव रखती है, तब वह शुद्ध नहीं मानी जा सकती। चूंकि वह यह नहीं जानती कि किसके साथ उसका विवाह होगा,