1. प्राचीन भारत के इतिहास पर प्रकाश - Page 19

4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि वे दस बैलगाड़ी-भर भोजन करते हैं। वे दैत्य के आकार के हैं। वे छह माह तक सोते हैं। उनके दस मुख हैं। राक्षस कौन हैं? उन्हें भी अमानवीय प्राणी बताया गया है। आकार में, भोजन करने की क्षमता में, जीवन की आदतों में वे असुरों के समान थे।

नागों का उल्लेख बहुत बार मिलता है। लेकिन नाग कौन हैं? नाग को सर्प या सांप के रूप में बताया गया है। क्या यह सच हो सकता है? चाहे यह सच हो या नहीं, यह ऐसा ही है, तथा हिंदू इसमें विश्वास करते हैं। प्राचीन भारत के इतिहास से पर्दा हटाया जाना चाहिए। इस उद्घाटन के बिना प्राचीन भारत इतिहास-विहीन रह जाएगा। सौभाग्य से बौद्ध साहित्य की मदद से प्राचीन इतिहास को उस मलबे से खोदकर निकाला जा सकता है, जिस मलबे के नीचे ब्राह्मण लेखकों ने पागलपन में उसे दबाकर रख दिया है।

बौद्ध साहित्य से बहुत हद तक मलबा हटाने व उसके नीचे छिपे तत्व बिल्कुल स्पष्ट रूप से देखने में मदद मिलती है।

बौद्ध साहित्य बताता है कि ‘देव’ मानव समुदाय से थे। बहुत से देव बुद्ध के पास अपनी शंकाओं के समाधान तथा कठिनाइयां दूर करने के लिए आते थे। यदि देव मानव नहीं होते तो ऐसा कैसे हो सकता था? इसके अलावा बौद्धों का प्रामाणिक साहित्य नागों से संबंधित जटिल प्रश्न पर समुचित प्रकाश डालता है। यह कोख से पैदा हुए नाग और अंडे से पैदा हुए नाग में भेद बताता है, और इस प्रकार यह स्पष्ट करता है कि ‘नाग’ शब्द के दो अर्थ होते हैं। इस शब्द का मूल अर्थ मानव समुदाय के लिए प्रयुक्त हुआ है।

इसके अलावा, असुर भी राक्षस नहीं हैं। वे भी जन-विशेष मानव ही हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, असुर सृष्टि के निर्माता प्रजापति के वंशज थे। वे नरक-दूत कैसे बन गए, यह पता ही नहीं है। लेकिन यह तथ्य लिपिबद्ध है कि वे पृथ्वी पर आधिपत्य करने के लिए देवों से लड़े, जिन्हें देवों ने जीत लिया और जिन्हें अंततः समर्पण करना पड़ा। यह बात स्पष्ट है कि असुर दैत्य नहीं, बल्कि मानव परिवार के सदस्य थे।

मलबे के इस उत्खनन से हम प्राचीन भारतीय इतिहास को एक नव प्रकाश में देख सकते हैं।