ब्राह्मणवाद की विजय
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निकालना कि भारत एक राष्ट्र है, भ्रांति को पाले रखना है। राष्ट्र क्या? राष्ट्र उस अर्थ में कोई देश नहीं होता, जिसकी भौतिक सीमाएं होती हैं, चाहे ये कितनी ही दूर तक क्यों न फैली हुई हों। राष्ट्र वह जनसंख्या नहीं होती जो एक भाषा, एक धर्म या एक प्रजाति होने के कारण परस्पर संश्लिष्ट रहती है। मैंने इस बारे में एक जगह कहा हैः
फ्राष्ट्रीयता व्यक्तिनिष्ठ मनोवैज्ञानिक अनुभूति है। यह अनुभूति जिसमें होती है, वे
सब यह अनुभव करते हैं कि वे एक-दूसरे के सगे-संबंधी हैं। राष्ट्रीयता की भावना
दुधारी तलवार की तरह होती है। यह अपने संबंधियों के प्रति मैत्री-भाव, और जो
लोग संबंधी नहीं हैं, उनके प्रति अमैत्री-भाव जागृत करती है। यह ‘वर्ण चेतना’ की
भावना, जो उन सभी लोगों को परस्पर एकसूत्र में बांधती है जो खून के रिश्ते की
सीमा में आते हैं और जो इस सीमा में नहीं आते, उनसे पृथक कर देती है। यह
अपने वर्ग से जुड़े रहने की इच्छा है। यह दूसरे वर्ग से न जुड़ने की इच्छा है। जिसे
राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय भावना कहा जाता है, उसका यही सार है। अपने ही वर्गों से
जुड़े रहने की इच्छा है। यह दूसरे वर्ग से न जुड़ने की इच्छा है। जिसे राष्ट्रीयता की
भावना कहा जाता है, उसका यही सार है। अपने ही वर्गों से जुड़े रहने की यह इच्छा,
जैसा कि मैंने कहा, व्यक्तिनिष्ठ मनोवैज्ञानिक भावना है और जो बात खासतौर से याद
रखने की है, वह यह है कि अपने ही वर्ग से जुड़े रहने की इच्छा का भूगोल-संस्कृति
या आर्थिक या सामाजिक संघर्ष से कोई सरोकार नहीं होता। कहीं भौगोलिक एकता
हो सकती है, लेकिन तो भी जुड़ने की इच्छा नहीं हो सकती। आर्थिक संघर्ष और वर्ग
विभाजन हो सकते हैं, लेकिन जुड़े रहने की इच्छा रहे। कहना यह है कि राष्ट्रीयता
मुख्यतः भूगोल, संस्कृति का विषय नहीं है।य्
वैदिक काल की अवनति ख्1, के दिनों, शूद्रों और स्त्रियों का स्थान बहुत नीचे हो गया था। बौद्ध धर्म के अभ्युदय ने इन दोनों की स्थिति में एक महान परिवर्तन ला दिया। संक्षेप में कहें तो यह कि बौद्ध काल में शूद्र संपत्ति, विद्या अर्जित कर सकता था और यहां तक कि वह राजा भी बन सकता था। बल्कि वह समाज में सर्वोच्च स्थान तक पहुंच सकता था, जो वैदिक शासन में ब्राह्मण के अधिकार में होता था। बौद्ध भिक्षु-व्यवस्था वैदिक ब्राह्मण-व्यवस्था का प्रतिरूप थी। ये दोनों ही व्यवस्थाएं अपने-अपने धर्म की व्यवस्थाओं में पद और प्रतिष्ठा की दृष्टि से एक-दूसरे के समान थीं। वैदिक काल में शूद्र ब्राह्मण बनने की कभी आकांक्षा नहीं कर सकता था, लेकिन वह भिक्षु बन सकता था और उसी पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकता था, जो ब्राह्मण को प्राप्त थी। वेदों के ब्राह्मणवाद में शूद्रों का प्रवेश वर्जित था, लेकिन भिक्षुओं के बौद्ध धर्म के द्वार शूद्रों के लिए खुले हुए थे। बहुत से शूद्रों ने, जो वैदिक काल में ब्राह्मण नहीं बन सके, बौद्ध
- अवनति के दिनों से मेरा तात्पर्य उस समय से है, जब ब्राह्मणों ने चातुर्वर्ण्य के संतुलन को अपनी श्रेष्ठता
का दावा कर बिगाड़ना शुरू कर दिया था।