184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की बनाए रखा और पितृ-सवर्ण्य नियम ने उच्च वर्णों की स्वयं को पर्याप्त सुगठित रखने में सहायता की। वे निम्न वर्ण में जा नहीं सकते थे, लेकिन वे विभिन्न वर्णों की माताओं से जन्मते रहे। ब्राह्मणवाद विभिन्न वर्णों के बीच संबंध के इस द्वार को खुला रखने का इच्छुक नहीं था। यह उसे बंद कर देने पर तुला बैठा था। उसने इसे ऐसी रीति से किया जो अप्रतिष्ठाजनक है। सीधा और सच्चा रास्ता अनुलोम विवाह को रोक देना था। लेकिन ब्राह्मणवाद ने ऐसा नहीं किया। उसने अनुलोम विवाह पद्धति को जारी रखा। उसने जो कुछ किया, वह यह कि उसने शिशु की स्थिति का निर्णय करने वाले नियम को बदल दिया। उसने पितृ-सवर्ण्य नियम के स्थान पर मातृ-सवर्ण्य नियम लागू किया, जिससे शिशु की स्थिति मां की स्थिति के आधार पर निर्धारित की जाने लगी। इस परिवर्तन से विवाह परस्पर सामाजिक संपर्क का वह साधन नहीं रह गया, जो वह मुख्य रूप से है। इससे उच्च वर्ण के पुरुष अपने बच्चों के प्रति अपने उत्तरदायित्व से सिर्फ इसलिए मुक्त हो गए कि ये बच्चे निम्न मां से पैदा हुए हैं। इसने अनुलोम विवाह का सिर्फ भाग, निम्न वर्णों को सताने और अपमानित करने और उच्च वर्णों को निम्न वर्ण की स्त्रियों के साथ कानूनी रूप में वेश्या कर्म करने, का एक साधन बना दिया। और व्यापक सामाजिक दृष्टि से इसने वर्णों को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग-अलग कर दिया। वर्णों में परस्पर यही अलगाव हिंदू समाज के लिए शाप हो गया है। इस सबके बावजूद कट्टठ्ठर हिंदू अभी भी यह विश्वास करता है कि जाति व्यवस्था एक आदर्श व्यवस्था है। लेकिन कट्टठ्ठर हिन्दुओं की ही चर्चा क्यों करें। ऐसे लोग तो प्रबुद्ध राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों में भी मिल जाएंगे। राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों, दोनों में ही ऐसे भारतीय आसानी से मिल जाते हैं जो जोरदार शब्दों से इसका खंडन करते हैं कि जाति-व्यवस्था राष्ट्र-प्रेम के आड़े आती है। यह मानते हैं कि भारत एक राष्ट्र है और जब कोई भारत राष्ट्र न कहकर भारत देश कहता है, तब वे बहुत गुस्सा हो जाते हैं जैसे कि उनके विरुद्ध कोई खराब बात कह दी गई हो। समझ में नहीं आता कि यह दृष्टिकोण क्यों है। राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों में ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं और उनसे यह आशा नहीं हो सकती कि वे अपने पूर्वजों के कुकृत्यों को स्वीकार कर लें। किसी से भी यह सवाल कीजिए, क्या भारत एक राष्ट्र न कहकर भारत देश कहता है, तब वे बहुत गुस्सा हो जाते हैं जैसे कि उनके विरुद्ध कोई खराब बात कह दी गई हो। समझ में नहीं आता कि यह दृष्टिकोण क्यों है। राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों में ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं और उनसे यह आशा नहीं हो सकती कि वे अपने पूर्वजों के कुकृत्यों का पर्दाफाश करने का साहस करें या उनके कुकृत्यों को स्वीकार लें। किसी से भी यह सवाल कीजिए, क्या भारत एक राष्ट्र है और वे एक स्वर में ‘हां’ कहें। आप इसके कारण पूछिए। वे कहेंगे कि भारत एक राष्ट्र है, पहला कारण तो यह कि भारत एक भौगोलिक इकाई है और दूसरा कारण यहां की संस्कृति में मूलभूत एकता का होना है। यह सब तो तर्क के लिए स्वीकार किया जा सकता है, फिर भी सच बात तो यह है कि इससे यह निष्कर्ष