7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 202

ब्राह्मणवाद की विजय

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मनु इस बात पर बल देता है कि शूद्र नीच रहेगा, पद के अयोग्य, अशिक्षित, संपत्ति-रहित और निंदित व्यक्ति रहेगा, उसे और उसकी संपत्ति का बलपूर्वक उपयोग किया जा सकेगा। पद के बारे में मनु निर्धारित करता हैः

8.20. कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है, अर्थात् जिसने न तो वेदों का अध्ययन

किया है और न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है, वह राजा के अनुरोध पर

उसके लिए धर्म का निर्वचन कर सकता है, अर्थात् न्यायाधीश के रूप में कार्य

कर सकता है, लेकिन शूद्र यह कभी भी नहीं कर सकता (चाहे वह कितना ही

विद्वान क्यों न हो)।

8.21. जिस राज्य में उसका राजा दर्शक की भांति केवल देखता रहता है और उसी

की ही उपस्थिति में शूद्र न्याय करता है, वह राज्य उसी प्रकार अधोगति को प्राप्त

होता है जिस प्रकार गाय दलदल में नीचे धंस जाती है।

8.272. अगर कोई शूद्र अभिमानपूर्वक ब्राह्मण को धर्मोपदेश देने का साहस करता

है, तो राजा उसके मुंह और कानों में खौलता हुआ तेल डलवाएं।

प्राचीन-काल में वेदों के अध्ययन का तात्पर्य विद्या था। मनु घोषित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को वेदों के अध्ययन करने का अधिकार नहीं है और यह अधिकार कुछ लोगों को ही प्राप्त है। मनु शूद्रों को वेदों के अध्ययन करने का अधिकार नहीं देता। वह यह विशेषाधिकार केवल तीन उच्च वर्णों को देता है। वह शूद्रों को अध्ययन करने से वंचित ही नहीं करता बल्कि उन व्यक्तियों के विरुद्ध दंड की व्यवस्था भी करता है जो शूद्रों को वेदों का अध्ययन करने में सहायता करेगा। जिस व्यक्ति को वेदों के अध्ययन करने का विशेषाधिकार प्राप्त है, उसके लिए मनु निर्देश देता हैः

4.99. उसे शूद्रों की उपस्थिति में वेदों का कभी भी अध्ययन नहीं करना चाहिए।

और निर्धारित करता हैः

3.156. जो शूद्र शिष्यों को शिक्षा देता है और जिसका गुरु कोई शूद्र है, वह श्राद्ध

में निमंत्रित करने के अयोग्य हो जाता है।

मनु के बाद के स्मृतिकार तो वेदों का अध्ययन करने पर शूद्रों के साथ किए जाने वाले निर्दय व्यवहार में उनसे भी आगे निकल गए। उदाहरण के लिए, कात्यायन का यह नियम है कि जो शूद्र किसी को वेद पढ़ते हुए सुन लेता है या वेद के एक शब्द का भी उच्चारण करने का साहस करता है, राजा उसकी जिह्वा को चिरवा देगा और उसके कानों में पिघलता हुआ जस्ता डलवाएगा।

संपत्ति के विषय में मनु कोई दया का व्यवहार नहीं करता और वह हठी भी है। मनु की संहिता के अनुसारः