7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 203

188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

10.129. किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए, चाहे वह इसके

लिए कितना ही समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है,

उसे इसका मद हो जाता है और वह अपने उद्धृत या उपेक्षापूर्ण व्यवहार से ब्राह्मणों

को कष्ट पहुंचाता है।

इस नियम का प्रयोजन नियम की अपेक्षा कहीं अधिक उग्र था। वस्तुतः मनु को यह विश्वास नहीं था कि शूद्र को संपत्ति अर्जित करने से रोकने के लिए यह निषेधाज्ञा यथेष्ट होगी। शूद्र को संपत्ति एकत्र कर ब्राह्मण की अवज्ञा करने का अवसर ही न मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए मनु ने अपनी संहिता में एक और खंड जोड़ दिया। इसमें उसने घोषित कियाः

8.417. यदि किसी ब्राह्मण का जीवन संकटग्रस्त हो, वह निस्संकोच शूद्र के धन

को अधिग्रहीत कर ले।

मनु निर्धारित करता है कि शूद्र का धन ही नहीं, बल्कि शूद्र का श्रम भी अधिग्रहीत किया जा सकेगा। मनु की निम्न व्यवस्था की तुलना करेंः

8.413. ब्राह्मण शूद्र को वेतन देकर या वेतन न देकर उसे दास कर्म करने के

लिए बाध्य कर सकता है क्योंकि ब्रह्मा ने ब्राह्मणों की सेवा के लिए ही शूद्रों

की सृष्टि की है।

मनु शूद्र से यह अपेक्षा करता है कि वह बोल-चाल में नीच होगा। वह अपनी बोलचाल में किस सीमा तक नीच हो सकता है, यह मनु द्वारा की गई निम्नलिखित व्यवस्थाओं से देखा जा सकता हैः

8.270. जो शूद्र द्विज व्यक्ति की उसे दारुण वचनों से संबोधित कर अवमानना

करता है, उसकी जीभ कटवा देनी चाहिए, क्योंकि वह नीच से उत्पन्न है।

8.271. यदि वह (द्विज) और उसकी जाति का नाम धृष्टतापूर्वक लेता है, तब

उसके मुख में दस अंगुल लंबी दहकती हुई लोहे की कील डाल देनी चाहिए।

मनु का उद्देश्य शूद्र को केवल नीच बनाकर ही नहीं, बल्कि पूरी तरह तिरस्कार के योग्य बना देना था। मनु शूद्र को अपने बड़े-बड़े नाम रखने की अनुमति नहीं देता। अगर मनु के ये अकाट्य प्रमाण नहीं उपलब्ध होते, तब यह विश्वास करना कठिन हो जाता कि ब्राह्मणवाद शूद्र पर अत्याचार करने में इतना अधिक कठोर और दया-शून्य था। विभिन्न वर्ग अपने-अपने बच्चों के नाम किस प्रकार रखें, इस संबंध में मनु के नियम पर विचार कीजिएः

2.31. ब्राह्मण के नाम का पहला भाग ऐसा हो जो शुभ हो, क्षत्रिय का शक्ति से

संबंधित, वैश्य का संपत्ति से और शूद्र का पहला नाम ऐसा हो जो तिरस्कारणीय

भाव का सूचक हो।