8. हिंदू समाज के आचार-विचार - Page 231

216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

या बौद्ध कहते हैं तब व्यापक अर्थ में हमारा आशय किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय से होता है, हम जाति या स्थान का भेद नहीं करते। जब हम किसी रूसी या किसी फारसी की चर्चा करते हैं, तब हम देश या कुल का संकेत करते हैं और वहां धर्म या मत का अंतर हमारा अभिप्रेत नहीं होता। लेकिन जब कोई व्यक्ति मुझसे कहता है कि मैं हिंदू हूं, तब मैं जान जाता हूं कि वह तीनों बातों का एक साथ उल्लेख कर रहा है - धर्म, कुल और देश का।य्

हिंदू धर्म के धार्मिक स्वरूप के बारे में सर अल्फ्रेड लायल कहते हैंः

फ्हिंदू धर्म बेतुके अंधविश्वासों, आचार-विचारों, उपासना पद्धतियों, आस्थाओं, रूढि़यों और पौराणिक कथाओं की पेचीदा गुंजलक है, जिन्हें धर्म-ग्रंथों और ब्राह्मणों के निर्देशों ने मान्यता दे रखी है और जिनका प्रचार ब्राह्मणों के उपदेशों द्वारा होता है।य्

फ्जिसे हिंदू अथवा हिंदू समुदाय के अधिकांश लोग अमल में लाते हैं वही हिंदू धर्म है।य्

अंत में, मैं एक हिंदू श्री जी.पी. सेन, द्वारा दी गई परिभाषा को उद्धृत करता हूं जो न सिर्फ हिंदू हैं, बल्कि हिंदू धर्म के अध्येता भी हैं। श्री सेन इंट्रोडक्शन टु दि स्टडी ऑफ हिंदूइज्म नामक अपनी पुस्तक में लिखते हैंः

क्या हिंदू धर्म में कोई ऐसा सिद्धांत नहीं है, जिसका सभी हिंदू अपने-अपने विभिन्न मतभेदों के बावजूद, पालन करना स्वेच्छया अपना कर्तव्य समझते हों? मुझे लगता है कि ऐसा सिद्धांत है और यह सिद्धांत जाति का सिद्धांत है। इस बारे में मतभेद हा सकता है कि हिंदू धर्म में कौन-कौन से मूल तत्व हैं। लेकिन इस बात में कोई मतभेद नहीं हो सकता कि हिंदू धर्म का एक मुख्य और अभिन्न अंग है जाति। प्रत्येक हिंदू - वह चाहे सिर्फ कानूनी हिंदू ही क्यों न हो, जाति में विश्वास करता है और इसी प्रकार प्रत्येक हिंदू की जो कानूनी हिंदू होने पर गर्व करता है, एक जाति होती है। हिंदू उसी प्रकार जाति में पैदा होता है, जिस प्रकार वह हिंदू धर्म में पैदा होता है। सच तो यह है कि कोई भी व्यक्ति हिंदू धर्म में तब तक पैदा नहीं समझा जा सकता जब तक वह किसी जाति में पैदा न हुआ हो। जाति और हिंदू धर्म एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। प्रो. मैक्समूलर ख्1, का कहना हैः

फ्आधुनिक हिंदू धर्म-जाति पर स्थित है, जैसे वह किसी चट्टठ्ठान पर हो, जिसे कोई भी तर्क हिला नहीं सकता।य्

इसका तात्पर्य यह हुआ कि चूंकि मनु ने जाति का सिद्धांत निर्धारित किया है और चूंकि हिंदू धर्म के मूल में जाति का सिद्धांत स्थित है, अतः मनुस्मृति को धर्म ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

  1. साइंस ऑफ रिलिजन, पृ. 28