8. हिंदू समाज के आचार-विचार - Page 233

218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1.100. पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह सब ब्राह्मणों का है, अर्थात् ब्राह्मण अच्छे कुल में जन्म लेने के कारण इन सभी वस्तुओं का स्वामी है।

यह कहना कोई बड़ी बात नहीं कि मनु के अनुसार ब्राह्मण समस्त सृष्टि का स्वामी है। क्योंकि मनु यह चेतावनी देता है किµ

9.317. जिस प्रकार शास्त्रविधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि, दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान, दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है।

9.319. इस प्रकार ब्राह्मण यद्यपि निंदित कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। तथापि ब्राह्मण सब प्रकार से पूज्य हैं, क्योंकि वे श्रेष्ठ देवता हैं।

देवता होने के कारण ब्राह्मण कानून और राजा से ऊपर है। मनु आदेश देता हैः 7.37. राजा प्रातःकाल उठकर ऋग्यजुः साम के ज्ञाता और विद्वान (राजधर्म में) ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करे। 7.38. वह वृद्ध ब्राह्मणों की प्रतिदिन सेवा करे जो वेद के ज्ञाता और शुद्ध हृदय हैं।

अंत में मनु कहता हैः

11.35. इस प्रकार ब्रह्मा (विश्व के) सृष्टा, शास्ता, गुरु (और इसलिए सारी सृष्टि के) संरक्षक घोषित किए जाते हैं। कोई भी व्यक्ति उनके प्रति न कोई अशुभ और न कोई कठोर वचन कहे।

मनु संहिता में विभिन्न व्यवसायों के बारे में नियम दिए गए हैं। जिनका विभिन्न वर्गों को पालन करना चाहिए।

1.88. स्वयंभू मनु ने ब्राह्मणों के कर्तव्य वेदाध्यान, वेद की शिक्षा देना, यज्ञ करना, अन्य को यज्ञ करने में सहायता देना और अगर वह धनी है, तब दान देना और अगर निर्धन है, तब दान लेना निश्चित किए।

1.89. प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, वेद का अध्ययन करना, विषय में आसक्ति नहीं रखना, संक्षेप में क्षत्रियों के कर्तव्य हैं।

1.90. पशुपालन, दान देना, यज्ञ करना, शास्त्रों को पढ़ना, व्यापार करना, ब्याज पर ऋण देना और खेती करना वैश्यों के कर्तव्य निश्चित या अनुमोदित किए गए। 1.91. ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक ही मुख्य कर्तव्य निश्चित किया, अर्थात् उक्त वर्गों की अनिंदित रहते हुए सेवा करना।