हिंदू समाज के आचार-विचार
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10.74. ऐसे ब्राह्मण जो उत्कृष्ट देवत्व प्राप्त करने के इच्छुक हैं और अपने कर्तव्य
के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ हैं, वे छह कार्यों को क्रमानुसार पूर्णरूपेण निष्पादित करें।
10.75. वेदों का अध्ययन, अध्यापन-यज्ञ करना, अन्य को यज्ञ करने में सहायता देना,
यदि पर्याप्त संपत्ति है तब निर्धनों को दान देना, यदि स्वयं निर्धन है तब पुण्यशील
व्यक्तियों से दान लेना, ये छह कर्तव्य प्रथम उत्पन्न वर्ग (ब्राह्मणों) के हैं।
10.76. लेकिन ब्राह्मण के लिए निर्धारित इन छह कर्मों में से तीन कर्तव्य उसकी
जीविका के लिए हैं - यज्ञ करने में सहायता देना, वेदों का अध्यापन और
पुण्यशील से दान लेना।
10.77. तीन कर्तव्य ब्राह्मणों तक सीमित हैं। वे क्षत्रियों के लिए नहीं हैं - वेदों
का अध्यापन, यज्ञ कराना और तीसरा, दान लेना।
10.78. ये तीन वैश्यों (विधि के तीन स्थाई नियम) के लिए भी वर्जित हैं,
क्योंकि प्रजापति मनु ने ये कर्तव्य उन दोनों (सैनिक और वाणिज्यिक) वर्गों के
लिए निश्चित नहीं किए हैं।
10.79. जीविका के लिए विशेष रूप से क्षत्रियों के कर्तव्य हैं। आयुध ग्रहण करना
(अस्त्र और शस्त्र), वैश्यों के कर्तव्य हैं व्यापार, पशुपालन और कृषि, लेकिन अगले
जन्म की दृष्टि से दोनों के कर्तव्य हैं - दान देना, अध्ययन और यज्ञ करना।
मनु श्रेणी और व्यवसाय निश्चित करने के साथ कुछ वर्गों को कुछ विशेषाधिकार देता है और कुछ के लिए दंड निर्धारित करता है।
जहां तक विशेषाधिकारों का संबंध है, विवाह से संबंधित विशेषाधिकारों पर पहले विचार कर लिया जाए। मनु कहता हैः
3.12. द्विज वर्ग के लोगों का प्रथम विवाह समान वर्ग की स्त्री के साथ हो,
लेकिन जो दुबारा विवाह करना चाहे तब क्रम के अनुसार वर्ग की स्त्री के साथ
विवाह करे।
3.13. शूद्र स्त्री केवल शूद्र की पत्नी बन सकती है, वह और वैश्य स्त्री वैश्य
पुरुष की, शूद्र और वैश्य स्त्री तथा क्षत्रिय स्त्री क्षत्रिय पुरुष की और ये तीनों
वर्गों की स्त्री तथा ब्राह्मणी ब्राह्मण की पत्नी हो सकती है।
इसके बाद व्यवसाय में भी कुछ विशेषाधिकार हैं। ये विशेष अधिकार तब और भी स्पष्ट हो जाते हैं, जब मनु यह निश्चित करता है कि मनुष्य को अपने ऊपर विपत्ति पड़ने पर क्या करना चाहिएः