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गर्त में डूबा पुरोहितवाद
प्राचीन आर्यों के समाज में पुरोहिताई के व्यवसाय पर ब्राह्मणों का एकाधिकार था। ब्राह्मणों को छोड़कर कोई अन्य पुरोहित नहीं बन सकता था। धर्म के अभिरक्षक के रूप में ब्राह्मण नैतिक और आध्यात्मिक मामलों में मार्गदर्शक हुआ करते थे। उनको ऐसे मानक स्थापित करने थे, जिनका लोग अनुसरण करते। क्या ब्राह्मणों ने यह मानक स्थापित किए थे? दुर्भाग्यवश जो प्रमाण हमारे पास हैं, वह दर्शाते हैं कि ब्राह्मण नैतिक रूप से अधोगति के सबसे गहरे गर्त में गिर चुके थे।
एक श्रोत्रिय ब्राह्मण से अपेक्षा की जाती थी कि वह खाद्य सामग्री का भंडार केवल एक सप्ताह तक के लिए रखे। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इस नियम की धज्जियां उड़ा दी। उन्हें संग्रह की लत लग गई थी, भंडारित की गई वस्तुएं, भोजन, पेय सामग्री, कपड़े, सज्जा सामग्री, बिस्तर, सुगंधित द्रव्य इत्यादि थीं।
ब्राह्मणों को मनोरंजक तमाशे देखने का व्यसन हो गया था, जैसेः
नर्तकी का नाच (नक्काम),
गीत-गायन (गीतम),
वाद्य-यंत्रों का संगीत (वदितम),
मेलों के तमाशे (पेखम),
गाथा का सस्वर पाठ (अक्खानम),
हस्त संगीत (पणिसरम),
भाटों के गीत (वेताल),
टम-टम वाद्य (कुंभथुनम),
सुंदर दृश्य (सोभानगरकम),
चांडालों द्वारा नटीय करतब (चांडाल-वमस-धोपनम्),
हाथियों, घोड़ों, भैसों, बैलों, बकरियों, भेड़ों, मुर्गों और बटेरों की लड़ाई,
लठैती, मुक्केबाजी, मल्ल में बल परीक्षण, और
13-16. दिखावटी लड़ाई, हाजरी लेना, युद्धाभ्यास, समीक्षा।