264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ने, जिनके लिए धर्म एक व्यापार था और जो कभी भी एक ईश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं रहे, अपने शासकों को प्रसन्न करने के लिए उनके इष्टदेव को एक उच्च और शक्तिशाली परमेश्वर के रूप में स्वीकार कर उसकी पूजा करनी आरंभ कर दी। अगर यह सही व्याख्या है तब मूल भगवत्गीता में यह क्षेपक 400 से 464 ई. के बीच जोड़ा गया होगा।
इन सब प्रमाणों से इस मत को सिद्ध करने में सहायता मिलती है कि भगवत्गीता को बौद्ध धर्म से पूर्व की रचना बताने के प्रयत्न सफल नहीं हो सकते। यह उन लोगों की हवाई कल्पना का नतीजा है जिन्हें बुद्ध और उनके क्रांतिकारी सिद्धांतों के प्रति तिरस्कार की भावना पीढ़ी दर पीढ़ी चली आई है। इतिहास इसे सिद्ध नहीं करता। इतिहास इस बात को बड़ी ही स्पष्टतापूर्वक सिद्ध करता है कि भगवत्गीता के वे अंश जिनका कुछ सैद्धांतिक महत्व है, हर प्रकार से बौद्ध सिद्धांतों और जैमिनि और बादरायण के सूत्रों के काफी बाद के हैं।
रचना-काल के बारे में विवेचन से केवल यही सिद्ध नहीं होता कि भगवत्गीता हीनयान बौद्ध धर्म के, बल्कि यह भी सिद्ध होता है कि महायान बौद्ध धर्म के भी बाद की है। प्रायः लोगों की यह धारणा है कि महायान बौद्ध धर्म का उद्भव बाद में हुआ था। कहा जाता है कि इसका उद्भव 100 ईसवी में हुआ, जब कनिष्क ने बौद्ध धर्म में आपसी मतभेद पर निर्णय करने के लिए तृतीय बौद्ध परिषद का आयोजन किया था। यह नितांत भ्रम है। ख्1, यह कहना सच नहीं कि परिषद होने के बाद बौद्ध धर्म के एक नए संप्रदाय का जन्म हुआ। जो कुछ हुआ, वह यह कि जो लोग वृद्ध हो चले थे, उनके लिए व्यंग्य के रूप में कुछ नए नाम चल पड़े। श्री किमूर का कहना है कि महायान बौद्धों के उस वर्ग का नाम है जिन्हें महासंघिक कहा जाता था। महासंघिकों का यह संप्रदाय उससे बहुत पहले बन गया था जितना कि कहा जाता है। अगर जनश्रुति पर विश्वास किया जाए तब हम कह सकते हैं कि बुद्ध के परिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद अर्थात् 307 ख्2, ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में बौद्ध सिद्धांतों को निश्चित करने के लिए हुई प्रथम बौद्ध परिषद के बाद यह अस्तित्व में आया और इस संप्रदाय ने बौद्ध धर्म के थेरवाद संप्रदाय के विरोध का नेतृत्व किया जिसे बाद में तिरस्कार स्वरूप हीनयान (अर्थात् निम्न पथ के अनुगामी) कहा गया। जिस समय महासंघिकों का, जिन्हें बाद में महायानवादी कहा गया, उदय हुआ, उस समय भगवत्गीता का कहीं पता भी नहीं था।
- इस सारे विषय पर देखिए, ए हिस्टोरिकल स्टडी ऑफ दि टर्म्स हीनयान एंड महायान और दि ओरिजिन
ऑफ महायान बुद्धिज्म, लेखक रीकन किमूर, कलकत्ता यूनिवर्सिटी 1927
- यह तब है जब बुद्ध के परिनिर्वाण की तिथि 543 ईसा पूर्व की मान ली जाए, लेकिन अगर उनके
परिनिर्वाण की तिथि 453 ईसा पूर्व मानी जाती है तब यह 217 ईसा पूर्व होगी।