प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता
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( iv ) मूल भगवत्गीता के तीसरे क्षेपक में वे श्लोक आते हैं, जिसमें कृष्ण को ईश्वर के स्तर से परमेश्वर के स्तर पर पहुंचा दिया गया है। यह क्षेपक अध्याय 10 और 15 में मिलता है।
जैसा कि मैंने कहा था कि भगवत्गीता के रचना-काल का सटीक निर्धारण करना व्यर्थ का कार्य है और इसकी तभी कोई उपयोगिता हो सकती है, जब हर क्षेपक के रचना-काल का पता लगाने की कोशिश की जाए। अगर इस दिशा में प्रयत्न किया जाए तब, जैसा कि मैंने कहा, दर्शन-रहित मूल गीता महाभारत के मूल पाठ, अर्थात् जय का भाग हो सकती है। मूल भगवत्गीता में पहला क्षेपक जिसमें कृष्ण को ईश्वर के रूप में व्यक्त किया गया है, मेगस्थनीज के कुछ बाद के समय का होना चाहिए जब कृष्ण केवल जनजातियों के ईश्वर थे। ख्1, यह कितने बाद का समय है, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह काफी बाद का समय होना चाहिए क्योंकि यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि शुरू में कृष्ण मत के प्रति ब्राह्मणों की मैत्री नहीं थी। वस्तुतः वे इसके विरोधी थे। ख्2, ब्राह्मणों को कृष्ण पूजा स्वीकार करने में कुछ समय अवश्य लगा होगा। ख्3,
मूल भगवत्गीता में दूसरा क्षेपक वह अंश है जहां सांख्य और वेदांत का विवेचन है। यह जैमिनि और बादरायण के सूत्रों के बाद रखे जाने चाहिए जिसका कारण दिया जा रहा है। इन सूत्रों के रचना-काल के बारे में प्रो. जैकोबी ने सतर्कतापूर्वक जांच की है। ख्4, उनका कहना है कि इन सूत्रों की रचना लगभग 200 से 300 ईसवी के बीच हुई।
मूल भगवत्गीता में तीसरा क्षेपक, जहां कृष्ण को ऊंचा उठाकर परमेश्वर का दर्जा दिया है, गुप्त सम्राटों के शासन-काल में जोड़ा गया होगा। इसका कारण स्पष्ट है। जिस प्रकार शक सम्राटों ने महादेव को अपना इष्ट देवता स्वीकार किया था उसी प्रकार गुप्त वंश के सम्राटों ने कृष्ण-वासुदेव को अपना इष्टदेव स्वीकार कर लिया था। ब्राह्मणों
- डॉ. भंडारकर अपनी पुस्तक शैविज्म एंड वैष्णविज्म (शैववाद और वैष्णववाद) में कहते हैं, ‘यदि
वासुदेव कृष्ण की उपासना प्रथम मौर्य सम्राट के राज्य-काल में प्रचलित थी तो यह उपासना मौर्य
वंश की स्थापना से बहुत पूर्व काल से ही शुरू हुई होनी चाहिए।’ यह एक ऐसा अपवादित कथन है
जिस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। परंतु मुझे ऐसा लगता है कि जनजातीय ईश्वर के रूप में
कृष्ण और विश्वव्यापी ईश्वर के रूप में कृष्ण के बीच अंतर किया जाना चाहिए। जनजातीय ईश्वर के
रूप में कृष्ण का वही समय हो सकता है जिसका सुझाव डॉ. भंडारकर ने दिया है लेकिन यह उनके
विश्वव्यापी रूप में पूजे जाने का नहीं हो सकता। गीता में हम उनके दूसरे रूप से संबंधित है। 2. देखें, श्याम शास्त्री मेमोरियल वोल्यूम।
कृष्ण मत का विरोध बहुत बाद में शंकराचार्य जैसों ने भी किया।
अमेरिकन ओरिएंटल सोसायटी की पत्रिका में दि डेट्स ऑफ दि फिलोसोफिल सूत्राज ऑफ दि ब्राह्मणाज
शीर्षक लेख, खंड 31, 1911