300 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बिना जमदग्नि का बछड़ा ले आए। इसके परिणामस्वरूप परशुराम ने अर्जुन पर आक्रमण किया और उसकी भुजाएं काट दीं। उसके पुत्र ने जमदग्नि का वध कर दिया। अपने पिता का वध किए जाने पर परशुराम उत्तेजित हो उठे और यह प्रतिज्ञा की कि मैं पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर दूंगा। उसने अपने शस्त्र उठाए और अर्जुन के सभी पुत्र-पौत्रों तथा हैह्य वंश के हजारों क्षत्रियों का विनाश कर दिया और पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया। इस तरह जब वे क्षत्रियों का विनाश कर चुके, तब उनके मन में करुणा उत्पन्न हुई और वे वन चले गए। कई हजार वर्षों के बीत जाने के बाद इस वीर का, जो स्वभावतः क्रोधी था, रैभ्य के पुत्र और विश्वामित्र के पौत्र ने भरी सभा में इन शब्दों द्वारा उपहास उड़ाया - ‘क्या ये प्रतर्दन तथा अन्य व्यक्ति वीर नहीं हैं, जो ययाति के नगर के यज्ञ में उपस्थित हुए हैं? क्या ये क्षत्रिय नहीं हैं? आप अपने संकल्प को पूर्ण करने में असफल रहे और इस सभा में व्यर्थ ही गर्व करते हैं। आप क्षत्रियों के डर के कारण पर्वत पर चले गए, जबकि पृथ्वी पर क्षत्रियों के सैकड़ों वंशज शासन करते आ रहे हैं।’ यह शब्द सुनकर परशुराम ने अपने हथियार उठाए। जो सैकड़ों क्षत्रिय बच गए थे, वे अब शक्तिशाली राजा बन गए थे। परशुराम ने इन सभी का उनकी संतति सहित वध किया और अनगिनत शिशु, जो गर्भस्थ थे, उनको भी मार डाला। फिर भी कुछ शिशुओं को उनकी माताओं ने बचा लिया।’
जो पाठक क्षत्रियों के बाद का इतिहास पढ़ने में रुचि रखते हैं, वे आदि पर्व का यह अंश देखेंः
‘इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर देने वाले जमदग्नि के पुत्र महेन्द्र पर्वत पर, जो सबसे उत्तम पर्वत था, तपस्या में लीन हो गए। ख्1, जब उन्होंने धरती को क्षत्रिय-विहीन कर दिया था तो क्षत्रियों की विधवाएं ब्राह्मणों के पास आईं और उनसे संतति की याचना की। तब धर्म परायण ब्राह्मणों ने निष्काम भाव से उन स्त्रियों के साथ सहवास किया जो बाद में गर्भवती हो गईं और उन्होंने वीर क्षत्रिय लड़के-लड़कियों को जन्म दिया, जिससे क्षत्रिय जाति आगे भी रहे। इस प्रकार जो क्षत्रिय उत्पन्न हुए, वे क्षत्रिय स्त्रियों से ब्राह्मणों के जाए हैं, उनकी संख्या बढ़ती गई। फिर ब्राह्मणों से हीन चार वर्णन बने।’
इन दोनों जातियों के बीच इस शत्रुता में एक-दूसरे को चुनौतियां दी जाती रहीं, जिससे यह प्रकट होता है कि दोनों पक्षों में क्रोधाग्नि जल रही थी। राजा निमि द्वारा ब्राह्मणों को अपने रथ में जोतना और घोड़ों की तरह उनसे अपना रथ खिंचवाना, इससे यह प्रकट होता है कि क्षत्रिय ब्राह्मणों का निरादर करने के लिए कितने कृतसंकल्प थे। कृतवीर्य अर्जुन ने ब्राह्मणों को जो चुनौती दी, उससे पता चलता है कि वह ब्राह्मणों को नीचा दिखाना चाहते थे। ब्राह्मण भी ऐसी चुनौती देने में नहीं चूकते थे। उन्होंने भी क्षत्रियों
- म्यूर, खंड 1, पृ. 451-452