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ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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हैं। तुमने इन दोनों के बारे में बताया, लेकिन इन दोनों में अंतर है। ब्राह्मण क्षत्रियों पर निर्भर होते हैं और क्षत्रिय ब्राह्मणों पर निर्भर नहीं होते। ब्राह्मण क्षत्रियों पर अत्याचार करते हैं और इसके लिए वेदों का सहारा लेते हैं। प्रजा की रक्षा, अर्थात् न्याय क्षत्रिय का धर्म है। ब्राह्मणों को उनसे जीविका प्राप्त होती है, तब ब्राह्मण क्षत्रियों से श्रेष्ठ क्यों कर हो सकते हैं? मैं आज से उन सभी ब्राह्मणों को अपने अधीन रखूंगा जो भिक्षा पर निर्भर करते हैं और जो अपने को श्रेष्ठ समझते हैं। चूंकि गायत्री ने आकाश में सत्य कहा है अतः मैं उन अनुशासनहीन ब्राह्मणों को अपने वश में करूंगा, जो मृग की खाल पहनते हैं। उन तीनों लोकों में कोई भी, चाहे वह कोई देव हो या मानव, मुझे राजसिंहासन से च्युत नहीं कर सकता, जिसके कारण मैं प्रत्येक ब्राह्मण से श्रेष्ठ हूं।’

‘यह सुनकर वायु देवता प्रकट हुए और अर्जुन से बोलेः ‘तुम इस दूषित भावना को त्याग दो और ब्राह्मणों का आदर करो। ख्1, यदि तुम अपना अहित करोगे तो तुम्हारे राज्य में विप्लव मच जाएगा। वे तुम्हें पराजित कर देंगे, वे तुम्हें अपने अधीन कर लेंगे। वे तुम्हें तुम्हारे राज्य से निष्कासित कर देंगे। कृतवीर्य ने पूछाः आप कौन हैं? वायु ने उत्तर दियाः ‘मैं देवताओं का दूत वायु हूं। मैं तुम्हें तुम्हारे हित की बात बता रहा हूं।’ कृतवीर्य ने कहाः ‘हे वायुदेव, ऐसी बात बता रहे हो यह कहकर आपने ब्राह्मणों के प्रति भक्ति और अनुराग का परिचय दिया है। यह बताइए कि क्या ब्राह्मण पृथ्वी पर उत्पन्न किसी भी जीव के समान है? या यह बताइए कि यह परम श्रेष्ठ ब्राह्मण क्या वायु जैसा है? अग्नि जल के समान है, या सूर्य, या आकाश जैसा है?

इसके पश्चात् वायु ने अनेक उदाहरण दिए, जिनमें ब्राह्मणों की श्रेष्ठता बताई गई थी। इस पर अर्जुन ने ब्राह्मणों के प्रति अपना बैर-भाव त्याग दिया और वह उनका मित्र बन गया। अनुशासन पर्व में उसने कहाः-

‘मैं सदा ब्राह्मणों के हित में उनके साथ में रहता हूं। ख्2, मैं ब्राह्मणों के लिए समर्पित हूं। और सदा उनकी इच्छाओं के अनुरूप कार्य करता हूं। और यह दत्तात्रेय (एक ब्राह्मण) की ही अनुकंपा है कि मुझे यह शक्ति और ख्याति प्राप्त हुई है और मैं धर्म-परायण हूं।’

दूसरे चरण में परशुराम का उल्लेख है, जिन्होंने क्षत्रियों का संहार किया था। शांति पर्व में इस प्रकरण का वर्णन इस प्रकार हैः

‘अर्जुन एक विनम्र और धर्मपरायण और दयालु स्वभाव का राजा था। इसलिए उसने किसी को कष्ट देने की बात कभी नहीं सोची। ख्3, परंतु उसके पुत्र हठधर्मी और अत्याचारी थे, इस कारण वे उसकी मृत्यु का कारण बन गए। वे अपने पिता को बताए

  1. म्यूर, खंड 1, पृ. 454

  2. म्यूर, खंड 1, पृ. 473

  3. वही, पृ. 454-455