302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वायु ने ब्राह्मणों की प्रभुता के बारे में केवल यही नहीं कहा, उन्होंने और भी काफी कुछ कहा। प्रत्येक बार उसने अर्जुन को एक उदाहरण बताया, जिसमें ब्राह्मणों की महत्ता का वर्णन था, और अंत में अर्जुन से एक प्रश्न पूछा ‘क्या तुम बता सकते हो कि कौन क्षत्रिय उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ है, जिसका प्रसंग दिया गया है? सोचकर ऐसे क्षत्रिय का नाम बताओ जो श्रेष्ठता में उनके समान हो। मुझे बताओ कि कोई क्षत्रिय क्या अत्रि की समानता कर सकता है।’
ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच यह वर्ग-संघर्ष युगों-युगों तक चलता रहा होगा। इस पृष्ठभूमि में इस वर्ग-युद्ध के प्रति मनु का दृष्टिकोण बहुत ही विचित्र लगता है।
मनुस्मृति के निम्नलिखित श्लोकों पर विचार कीजिएः
4.135. जो समृद्धिशाली होना चाहता है उसे चाहिए कि वह क्षत्रिय, सांप और
विद्वान ब्राह्मण की कभी भी उपेक्षा न करे, चाहे वह कितने ही निर्बल क्यों न हों।
4.136. क्योंकि ये तीनों अनाहत होने पर उसे पूर्ण रूप से विनष्ट कर देंगे, अतः
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह कभी इनकी उपेक्षा न करे।
10.322. ब्राह्मण के बिना क्षत्रिय संपन्न नहीं हो सकता, क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण
समृद्ध नहीं होता। ब्राह्मण और क्षत्रियों का निकट संबंध हैं। इसलिए वे इस लोक
और पर-लोक में समृद्ध होते हैं।
यहां यह स्पष्ट है कि मनु इन दोनों के बीच मेल करा देना चाहता है। मनु किसके विरुद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियों को आपस में मिलाना चाहता है? क्या यह प्रयास इसलिए था कि ये दोनों पिछली शत्रुता को भूल जाएं या इसलिए था कि किसी अनुचित उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये किसी षड्यंत्र में परस्पर मिल जाएं। वे क्या परिस्थितियां थीं, जिन्होंने मनु को इस बात के लिए विवश किया कि वे ब्राह्मणों को यह सलाह दें कि वे क्षत्रियों के साथ युगों पुराने अपने वैमनस्य को भूल जाएं और सहायता के लिए आगे आएं। ये परिस्थितियां बहत ही कठिन और अनिवार्य रही होंगी, क्योंकि दोनों वर्गों के बीच मैत्री का कोई आधार नहीं बचा था। ब्राह्मणों ने क्षत्रियों की जी भर के निंदा की। उनकी प्रतिष्ठा को खुलेआम यह कहकर चोट पहुंचाई कि क्षत्रिय ब्राह्मणों की अवैध संतान हैं, जो उन्होंने क्षत्रिय विधवाओं से जन्मी है। क्षत्रियों की भावनाओं को आघात पहुंचाने के लिए ब्राह्मणों ने क्षत्रियों से यह भी कहलवा लिया कि वीरता में भी ब्राह्मण क्षत्रियों से श्रेष्ठ हैं, जैसा कि भीष्म से कहलाया गयाः
ब्राह्मणों की शक्ति देवताओं का भी संहार कर सकती है जो इस संसार के स्वामी कहे जाते हैं। ख्1, कोई ब्राह्मण चाहे चन्दन का तिलक लगाता हो, अथवा कीचड़ में सन
- म्यूर, खंड 1, पृ. 473-474