12. शूद्र और प्रतिक्रांति - Page 325

310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विश्वास रखते थे। शूद्रों को आर्य स्वीकार किया गया था और कौटिल्य के अर्थशास्त्र तक में उन्हें आर्य कहा गया है।

शूद्र आर्य समुदाय के अभिन्न, जन्म-जात और सम्मानित सदस्य थे। यह बात यजुर्वेद में उल्लिखित एक स्तुति से पुष्ट होती है जो प्रार्थना के रूप में कही गई है। यह इस प्रकार हैः ‘हे ईश्वर! हमारे पुरोहितों को वैभव दो। हमारे शासकों को संपन्न करो। वैश्यों और शूद्रों को समृद्ध करो। मुझे समृद्ध करो।’

यह एक उल्लेखनीय प्रार्थना है, उल्लेखनीय इस कारण, क्योंकि इससे पता चलता है कि शूद्र आर्य समुदाय का सदस्य होता था और वह उसका सम्मानित अंग था।

राजा के राज्याभिषेक के समय शूद्रों को भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समान आमंत्रित किया जाता था। यह बात महाभारत में दिए गए पांडवों के ज्येष्ठ भाई युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के वर्णन से पुष्ट होती है। शूद्र ने राजतिलक के समय समारोह में भाग लिया था। नीलकंठ नामक एक प्राचीन विद्वान के अनुसार, जो राज्याभिषेक समारोह का वर्णन करते हैं, ‘चार प्रमुख मंत्री, ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र ने नए राजा का अभिषेक किया। इसके पश्चात् प्रत्येक वर्ण के प्रमुखों और छोटी जातियों के प्रमुखों ने भी पवित्र जल से राजा का अभिषेक किया। इसके पश्चात् द्विजों ने जयघोष किया।’ वैदिक युग के पश्चात् और मनु के पूर्व जन-प्रतिनिधियों का एक वर्ग होता था, जिन्हें रत्नी कहा जाता था। राजा के राज्यारोहण के समय वे विशेष भूमिका निभाते थे। उन्हें रत्नी इसलिए कहा जाता था कि उनके पास रत्न होते थे, जो प्रभुता का प्रतीक होता था। राजा को प्रभुता तभी प्राप्त होती थी, जब रत्नीगण उसे सत्ता के प्रतीक स्वरूप रत्न भेंट करते थे। वह प्रभुता प्राप्त होने के उपरांत प्रत्येक रत्नी के घर जाता था और उसे उपहार देता था। महत्वपूर्ण बात यह है कि शूद्र भी एक रत्नी था।

प्राचीन समय में शूद्र दो महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाओं के सदस्य हुआ करते थे, जिन्हें जनपद और पौर कहा जाता था, और वे इन संस्थाओं के सदस्य होने के कारण ब्राह्मण तक से विशेष सम्मान के अधिकारी होते थे।

यह निर्विवाद सत्य है कि प्राचीन आर्य समाज में शूद्रों ने उच्च राजनीतिक गौरव प्राप्त किया था। वे राज्य के मंत्री बन सकते थे। महाभारत में इसका प्रमाण मिलता है। महाभारतकार अपनी स्मृति के आधार पर 37 मंत्रियों की एक सूची का उल्लेख करता है, उसमें चार मंत्री ब्राह्मण, आठ मंत्री क्षत्रिय, इक्कीस मंत्री वैश्य और तीन मंत्री शूद्र तथा एक मंत्री सूत था।

  1. शुक्ल यजुर्वेद, पृ. 200