12. शूद्र और प्रतिक्रांति - Page 327

312 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के दृष्टांत से बढ़कर क्या दृष्टांत हो सकता है जो भारत का सम्राट ही नहीं था, बल्कि वह शूद्र भी था और उसका साम्राज्य वह साम्राज्य था जिसे शूद्रों ने बनाया था।

वेदों का अध्ययन करने के बारे में शूद्रों के अधिकारों के प्रश्न पर छांदोग्य उपनिषद उल्लेखनीय है। इसमें जनश्रुति नामक एक व्यक्ति की कथा आती है, जिसे वेद-विद्या का ज्ञान रैक्व नामक आचार्य ने दिया था। वह व्यक्ति एक शूद्र था। यदि यह एक सत्य कथा है तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि एक समय ऐसा भी था, जब अध्ययन के संबंध में शूद्रों पर कोई प्रतिबंध नहीं था।

केवल यही बात नहीं थी कि शूद्र वेदों का अध्ययन कर सकते थे। कुछ ऐसे शूद्र भी थे, जिन्हें ऋषि-पद प्राप्त था और जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की। कवष एलूष ख्1, नामक ऋषि की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है। वह एक ऋषि था और ऋग्वेद के दसवें मंडल में उसके रचे हुए अनेक मंत्र हैं। ख्2, वैदिक कर्म में और यज्ञादि करने के बारे में शूद्रों की आध्यात्मिक क्षमता के प्रश्न पर जो सामग्री मिलती है, वह निम्नलिखित हैं। पूर्व-मीमांसा के प्रणेता जैमिनि ख्3, ने बदरी नामक एक प्राचीन आचार्य का उल्लेख किया है, जिनकी कृति अनुपलब्ध है। यह इस मत के व्याख्याता थे कि शूद्र भी वैदिक यज्ञ करा सकते हैं। भारद्वाज श्रौत सूत (5.28) में स्वीकार किया गया है कि विद्वानों का एक ऐस वर्ग भी है जो वैदिक यज्ञ के लिए आवश्यक तीन पवित्र अग्नियों को उत्पन कर सकता है। कात्यायन श्रौत सूत्र (1 और 5) का भाष्यकार यह स्वीकार करता है कि कुछ वैदिक ऋचाएं ऐसी हैं, जिनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि शूद्र वैदिक कर्म करने के योग्य हैं। शतपथ ब्राह्मण (1.1.4.12) में आचार विषयक एक नियम का उल्लेख है, जिसका आचारण यज्ञ कराने वाले ब्राह्मण को करना होता था। यह उस विधि के संबंध में है जिसके अनुसार पुरोहित को हविष्कूट (यज्ञ कराने वाले व्यक्ति)को संबोधित करना चाहिए। यह नियम इस प्रकार हैः एहि (यहां आओ) यह ब्राह्मणों के लिए कहा गया है। आगहि (आगे बढ़ो) यह वैश्यों के लिए है। आद्रव (जल्दी आओ), यह राजन्य (क्षत्रिय) के संबंध में है और आधाव (भाग कर) आओ, यह शूद्र के लिए है।

शतपथ ब्राह्मण ख्4, में ऐसा प्रमाण मिलता है कि शूद्र सोम यज्ञ करा सकता था और देवताओं का पेय सोम ग्रहण कर सकता था। इसमें कहा गया है कि सोम यज्ञ में ‘पयोव्रत’

  1. ऐतरेय ब्राह्मण, खंड 2, पृ. 112

  2. मैक्समूलर-एनशिएंट संस्कृत लिट्रेचर (1860)

  3. काणे कृत हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र में उद्धृत

  4. वही