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शूद्र और प्रतिक्रांति

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(केवल दुग्ध पान करने का व्रत) के स्थान पर शूद्र के लिए ‘मस्तु’ (दही का पानी) निर्धारित था। एक अन्य स्थान पर शतपथ ब्राह्मण ख्1, कहता हैः

‘चार वर्ण हैंः ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र। इसमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो सोम का तिरस्कार करता हो। यदि उनमें से कोई ऐसा करता है तो उसे प्रायश्चित करना होगा।’

इससे पता चलता है कि शूद्रों के लिए सोमपान करने की अनुमति ही नहीं थी, वरन् यह शूद्र सहित सभी के लिए अनिवार्य था। परंतु अश्विनी कुमारों की कथा में इस बात का निश्चित प्रमाण मिलता है कि शूद्र को दैवीय सोम के पान करने का अधिकार था।

यह कथा ख्2, इस प्रकार है कि एक बार अश्विनी कुमारों की दृष्टि सुकन्या पर पड़ी जिसने स्नान किया ही था और जो निर्वस्त्र थी। वह तरुणी थी अैर उसका विवाह च्यवन नामक ऋषि से हुआ था जो विवाह के समय इतने वृद्ध हो चुके थे कि उनकी मृत्यु कभी भी हो सकती थी। अश्विनी कुमार सुकन्या के सौंदर्य को देख उस पर मुग्ध हो गए और उन्होंने उससे कहा कि, ‘तुम हम में से किसी को भी अपना पति चुन लो, तुम्हें अपनी युवावस्था व्यर्थ में गवाना शोभा नहीं देता।’ उसने यह कहकर इंकार कर दिया कि ‘मैं एक पतिव्रता स्त्री हूं’। अश्विनी कुमारों ने उससे फिर कहा और उसे इस बार एक लालच दिया ‘हम स्वर्ग से आए प्रख्यात चिकित्सक हैं। हम तुम्हारे पति को युवा और सुंदर बना देंगे। इसलिए तुम हममें से किसी को भी अपना पति बना लो।’ वह अपने पति के पास गई और उसने इस प्रस्ताव के बारे में अपने पति को बताया। च्यवन ने सुकन्या से कहा, ‘तुम ऐसा ही करो,’ और बात तय हो गई। और अश्विनी कुमारों ने च्यवन को युवक बना दिया। तब ये प्रश्न उठा कि क्या अश्विनी कुमार सोम के अधिकारी हैं, जो देवताओं का पेय है। इंद्र ने इस पर आपत्ति की और कहा कि अश्विनी कुमार शूद्र हैं और इसलिए वे सोम के अधिकारी ही नहीं हैं। च्यवन ने, जो अश्विनी कुमारों से यौवन प्राप्त कर चुके थे, इंद्र की इस आपत्ति का खंडन किया और उसे अश्विनी कुमारों को सोम देने के लिए विवश किया।

उस समय यदि शूद्र को अपने से संबंधित यज्ञ-कर्म करने की अनुमति नहीं थी, तो इन सब प्रावधानों का कोई अर्थ नहीं हो सकता था। ऐसे भी प्रमाण हैं कि शूद्र स्त्री ने अश्वमेध ख्3, नामक यज्ञ में भाग लिया था। जहां तक उपनयन संस्कार और यज्ञोपवीत

  1. म्यूर द्वारा उद्धृत संस्कृत टैक्स्ट्स, खंड 1, पृ. 367

  2. वी. फासवायल, इंडियन माइथोलोजी, पृ. 128-32

  3. जायसवालµ इंडियन पॉलिटी, भाग 2, पृ. 17