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नारी और प्रतिक्रांति

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होने पर यह संपत्ति ब्याज सहित लौटानी होगी। राक्षस और पिशाच विवाह के संदर्भ में वह संपत्ति चोरी की संपत्ति समझी जाएगी।’

‘जिस नारी को अनिश्चित-काल तक भरण-पोषण मिलने का अधिकार है, उसे उसकी आवश्यकता के अनुसार अन्न और वस्त्र या भर्ता की आयु के अनुपात में हो तो अधिक आवश्यकतानुसार उपलब्ध कराए जाएं। यदि वह अवधि, जिसमें वस्तुएं और इसके अलावा धनराशि का 1/10 भाग भी दिया जाना है) सीमित है तब धन का एक निश्चित भाग जो भर्ता की आय के अनुसार निश्चित किया गया हो, तो वह उस नारी को दिया जाए, बशर्ते उसे शुल्क जो उसे उसके पति की अनुमति के अनुसार देना है स्त्री धन क्षतिपूर्ति की राशि नहीं दी गई है। यदि वह अपने श्वसुर कुल के किसी व्यक्ति के संरक्षण में रहना चाहती है अथवा वह स्वतंत्र रहना आरंभ कर देती है, उसके भरण-पोषण के लिए उसके पति पर दावा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार भरण-पोषण का निर्धारण होता है।’

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि कौटिल्य के समय में कोई पत्नी अपने पति के विरुद्ध प्रताड़ना और मानहानि होने पर अदालत में जा सकती थी।

संक्षेप में, मनु से पहले नारी स्वतंत्र थी और पुरुष की समान भागीदार थी। मनु ने उसे पदावनत क्यों किया?