334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वैज्ञानिक समाजवाद से कार्ल मार्क्स का यह अभिप्राय था कि उसका समाजवाद अपरिहार्य तथा अनिवार्य प्रकार का था और समाज उसकी ओर अग्रसर हो रहा है तथा उसकी गति को आगे बढ़ने से कोई चीज नहीं रोक सकती। मार्क्स के इस दावे व विचारधारा को सिद्ध करना है, जिसके लिए उसने मुख्य रूप से परिश्रम किया ।
मार्क्स की अवधारणा निम्नलिखित प्रमेयों पर आधारित हैः
- दर्शन का उद्देश्य विश्व का पुनर्निमाण करना है, ब्रह्मांड की उत्पत्ति की
व्याख्या करना नहीं।
- जो शक्तियां इतिहास की दिशा को निश्चित करती है, वे मुख्यतः आर्थिक
होती है।
समाज दो वर्गों में विभत्तQ है- मालिक तथा मजदूर।
इन दोनों वर्गों के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता है।
मजदूरों का मालिकों द्वारा शोषण किया जाता है। मालिक उस अतिरिक्त
मूल्य का दुरुपयोग करते हैं, जो उन्हें अपने मजदूरों के परिश्रम के परिण्
ामस्वरूप मिलता है।
- उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण, अर्थात् व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन
करके शोषण को समाप्त किया जा सकता है।
- इस शोषण के फलस्वरूप श्रमिक और अधिकाधिक निर्बल व दरिद्र बनाए
जा रहे हैं।
- श्रमिकों की इस बढ़ती हुई दरिद्रता व निर्बलता के कारण श्रमिकों की
क्रांतिकारी भावना उत्पन्न हो रही है और परस्पर विरोध वर्ग-संघर्ष के रूप
में बदल रहा है।
- चूंकि श्रमिकों की संख्या स्वामियों की संख्या से अधिक है, अतः श्रमिकों
द्वारा राज्य को हथियाना और अपना शासन स्थापित करना स्वाभाविक है।
इसे उसने ‘सर्वहारा वर्ग की तानाशाही’ के नाम से घोषित किया है।
- इन तत्वों का प्रतिरोध नहीं किया जा सकता, इसलिए समाजवाद अपरिहार्य
है।
म्ुझे आशा है, मैंने उन विचारों का सही उल्लेख किया है जो मार्क्सवादी समाज के मूल आधार हैं।