बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स
- मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं।
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जो चीज महत्वपूर्ण है वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म।
सबके प्रति मैत्री का सहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना
चाहिए।
- प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने
के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की।
अच्छा आचरण-विहीन ज्ञान खतरनाक होता है।
कोई भी चीज भ्रमातीत व अचूक नहीं होती । कोई भी चीज सर्वदा बाध्यकारी
नहीं होती। प्रत्येक वस्तु छानबीन तथा परीक्षा के अध्यधीन होती है।
कोई वस्तु सुनिश्चित तथा अंतिम नहीं होती।
प्रत्येक वस्तु कारण-कार्य संबंध के नियम के अधीन होती है।
कोई भी वस्तु स्थाई या सनातन नहीं है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील होती
है। सदैव वस्तुओं में होने का क्रम चलता रहता है।
युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है।
पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।
बुद्ध का संक्षिप्त रूप में यही सिद्धांत है। यह कितना प्राचीन, परंतु कितना नवीन है। उनके उपदेश कितने व्यापक तथा कितने गंभीर हैं।
कार्ल मार्क्स का मौलिक सिद्धांत
आइए, अब हम कार्ल मार्क्स द्वारा मौलिक रूप से प्रस्तुत मूल सिद्धांत का विवेचन करें। इसमें सदेंह नहीं कि मार्क्स आधुनिक समाजवाद या साम्यवाद का जनक है। परंतु उसकी रुचि केवल समाजवाद के सिद्धांत को प्रतिपादित व प्रस्तुत करने मात्र में ही नहीं थी। यह कार्य तो उससे बहुत पहले ही अन्य लोगों द्वारा कर दिया गया था। मार्क्स की अधिक रुचि इस बात को सिद्ध करने में थी कि उसका समाजवाद वैज्ञानिक है। उसका जिहाद पूंजीपतियों के विरुद्ध जितना था, उतना ही उन लोगों के विरुद्ध भी था, जिन्हें वह स्वप्नदर्शी या अव्यवहारिक समाजवादी कहता था। वह उन दोनों को ही पसंद नहीं करता था। इस बात पर इसलिए ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि मार्क्स अपने समाजवाद के वैज्ञानिक स्वरूप को सबसे अधिक महत्व देता था। जिन सिद्धांतों को मार्क्स ने प्रस्तुत किया, उनका उद्देश्य कुछ और नहीं, केवल इसके उस दावे व विचारधारा को स्थापित करना था कि उसका समाजवाद वैज्ञानिक प्रकार का था, स्वप्नदर्शी व अव्यवहारिक नहीं।