336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- समाज की भलाई के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्तिगत संपत्ति का
उन्मूलन करके, दुःख का निराकरण किया जाए।
बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स के बीच तुलना
जो मार्क्सवादी सिद्धांत अस्तित्व में है, उससे कुछ बातों को लेकर अब बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स के बीच तुलना की जा सकती है।
पहली बात पर बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स में पूर्ण सहमति है। उनमें कितनी अधिक सहमति है, इस बात को दर्शाने के लिए मैं नीचे बुद्ध तथा पोत्तपाद नामक ब्राह्मण के बीच हुए वार्तालाप के एक अंश को अद्धृत करता हूंµ
इसके बाद उन्हीं शब्दों में पोत्तपाद ने बुद्ध से निम्नलिखित प्रश्न पूछेः
क्या संसार शाश्वत नहीं है?
क्या संसार सीमित है?
क्या संसार असीम है?
क्या आत्मा वैसी ही है, जैसा शरीर है?
क्या आत्मा एक वस्तु है और शरीर दूसरी?
क्या सत्य को पा लेने वाला व्यक्ति मृत्यु के बाद फिर जन्म लेता है?
क्या वह न तो पुनः जन्म लेता है, न मृत्यु के बाद फिर रहता है?
और प्रत्येक प्रश्न का बुद्ध ने एक ही उत्तर दिया, जो इस प्रकार थाः
‘पोत्तपाद यह भी एक विषय है, जिस पर मैंने कोई मत प्रकट नहीं किया है।’
‘परंतु बुद्ध ने उस पर कोई मत प्रकट क्यों नहीं किया है?’
(क्योंकि) ‘ये प्रश्न उपयोगी नहीं हैं। उनका संबंध धर्म से नहीं है, यह सही आचरण के लिए भी सहायक नहीं है, न अनासक्ति, न लालसा व लोभ से शुद्धिकरण, न शांति, न हृदय की शांति, न वास्तविक ज्ञान, न अंतर्ज्ञान की उच्चतर अवस्था, न निर्वाण में सहायक है। अतएव, यही करण है कि मैं इसके संबंध में कोई विचार प्रकट नहीं करता।’
दूसरी बात के संबंध में मैं नीचे बुद्ध तथा कौशलµ नरेश प्रसेनजित के बीच हुए वार्तालाप से एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूंः
‘इसके अतिरिक्त राजाओं के बीच, कुलनों के बीच, ब्रह्मणों के बीच, गृहस्थों के बीच, माता तथा पुत्र के बीच, पुत्र तथा पिता के बीच, भाई तथा बहन के बीच, साथियों तथा साथियों के बीच सदा संघर्ष चलता रहता है।’