बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स
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यद्यपि ये शब्द प्रसेनजित के हैं, परंतु बुद्ध ने इस बात से इंकार नहीं किया कि यह समाज का सही चित्र प्रस्तुत करता है।
जहां तक वर्ग-संघर्ष के प्रति बुद्ध के दृष्टिकोण का संबंध है, अष्टांग मार्ग का उनका सिद्धांत इस बात को मान्यता देता है कि वर्ग-संघर्ष का अस्तित्व है और यह वर्ग-संघर्ष ही है, जो दुःख व दुर्दशा का कारण होता है।
तीसरे प्रश्न के संबंध में मैं बुद्ध तथा पोत्तपाद के वार्तालाप में से उक्त यह अंश उद्धृत करता हूंः
‘फिर वह क्या है, जिसका आप महानुभाव ने निश्चय किया है।’
‘पोत्तपाद, मैंने यह स्पष्ट किया है कि दुःख तथा कष्ट का अस्तित्व है। वे विद्यमान रहते है।’
मैंने यह समझाया है कि दुःख का मूल व उत्पत्ति क्या है। मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि दुःख का अंत क्या है, मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि वह कौन-सा तरीका है, जिसके द्वारा व्यक्ति दुःख का अंत कर सकता है।
- ‘और बुद्ध ने उसके संबंध में यह कथन क्यों किया?’
‘पोत्तपाद, क्योंकि वह प्रश्न उपयोगी है, वह धर्म से संबंधित है, वह सही आचरण, अनासक्ति, लालसा व लोभ से त्राण, शांति, हृदय की शांति, वास्तविक ज्ञान, पथ की उच्चतर अवस्था और निर्वाण में सहायक है। इसलिए पोत्तपाद यही कारण है कि मैंने उसके संबंध में कथन किया है।’
यहां शब्द यद्यपि भिन्न हैं, परंतु उनका अर्थ वही है। यदि हम यह समझ लें कि दुःख का कारण शोषण है, तब बुद्ध इस विषय में मार्क्स से दूर नहीं है। व्यक्तिगत संपत्ति के प्रश्न के संबंध में बुद्ध तथा आनंद के बीच वार्तालाप के निम्नलिखित उदाहरण से पर्याप्त सहायता मिलती है। आनंद द्वारा पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए बुद्ध ने कहाः
‘मैंने कहा है कि धन-लोलुपता संपत्ति के स्वामित्व के कारण होती है। यह ऐसा किस प्रकार है, इस बात को आनंद, इस प्रकार समझा जा सकता है। जहां पर किसी प्रकार की संपत्ति का अधिकार नहीं है, वह चाहे किसी व्यक्ति के द्वारा या किसी भी वस्तु के लिए हो, वहां कोई संपत्ति या अधिकार न होने के कारण संपत्ति की समात्ति या अधिकार की समाप्ति पर क्या कोई धनलोलुप या लालची दिखाई पड़ेगी?’
‘नहीं, प्रभु ।’
‘तब आनंद, स्वामित्व के आधार, उसकी उत्पत्ति, दुराग्रह का प्रश्न ही कहां होता?’