बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स
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इस कष्ट तथा दुरुख के कारण क्या हो सकते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में बुद्ध ने यह पाया कि इसके कारण केवल दो हो सकते हैं।
मनुष्य के कष्ट तथा दुःख उसके अपने ही दुराचरण के फलस्वरूप हो सकते हैं। दुःख के इस कारण का निराकरण करने के लिए उन्होंने पंचशील का अनुपालन करने का उपदेश दिया।
पंचशील में निम्नलिखित बातें आती हैः
किसी जीवित वस्तु को न ही नष्ट करना और न ही कष्ट पहुँचाना।
चोरी, अर्थात् दूसरे की संपत्ति को धोखाधड़ी या हिंसा द्वारा न हथियाना
ओैर न उस पर कब्जा करना।
झूठ न बोलना।
तृष्णा न करना।
मादक पदार्थों का सेवन न करना।
बुद्ध का मत है कि संसार में कुछ कष्ट व दुःख मनुष्य का मनुष्य के प्रति पक्षपात है। इस पक्षपात का निराकरण किस प्रकार किया जाए? मनुष्य के प्रति मनुष्य के पक्षपात का निराकरण करने के लिए बुद्ध ने आर्य अष्टांग मार्ग निर्धारित किया। इस अष्टांग मार्ग के तत्व इस प्रकार हैंः
सम्यक दृष्टि, अर्थात् अंधविश्वास से मुक्ति,
सम्यक संकल्प जो बुद्धिमान तथा उत्साहपूर्ण व्यक्तियों के योग्य होता है।
सम्यक वचन अर्थात् दयापूर्ण, स्पष्ट तथा सत्य भाषण,
सम्यक आचरण अर्थात् शांतिपूर्ण, ईमानदारी तथा शुद्ध आचरण,
सम्यक जीविका अर्थात् किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार की क्षति
या चोट न पहुँचाना,
अन्य सात बातों में सम्यक् परिरक्षण,
सम्यक स्मृति अर्थात् एक सक्रिय तथा जागरूक मस्तिष्क, और
सम्यक समाधि अर्थात् जीवन के गंभीर रहस्यों के संबंध में गंभीर विचार।
इस आर्य अष्टांग मार्ग का उद्देश्य पृथ्वी पर धर्मपरायणता तथा नयायसंगत राज्य की स्थापना करना तथा उसके द्वारा संसार के दुःख तथा विषाद को मिटाना है।
सिद्धांत का तीसरा अंग निब्बान का सिद्धांत है। निब्बान का सिद्धांत आर्य अष्टांग मार्ग के सिद्धांत का अभिन्न अंग है। निब्बान के बिना अष्टांग मार्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती।