14. बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - Page 353

338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. ‘मैंने कहा कि दुराग्रह स्वामित्व का मूल है। अब आनंद वह ऐसा किस प्रकार व क्यों है? इसे इस प्रकार समझना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति में किसी वस्तु के संबंध में, वह चाहे जो हो, किसी प्रकार की कोई भी आसक्ति नहीं है तो क्या ऐसा होने पर आसक्ति के अंत होने पर अधिकार या संपत्ति का आभास होगा?’

‘नहीं होगा, प्रभु ।’

चौथी बात के संबंध में किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। भिक्षु संघ के नियम इस विषय में सर्वोत्त्तम प्रमाण हैं। नियमों के अनुसार एक भिक्षु केवल निम्नलिखित आठ वस्तुओं को ही व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में रख सकता है । इनसे अधिक नहीं। ये आठ वस्तुएं इस प्रकार हैंः

1.2.3. प्रतिदिन पहनने के लिए तीन वस्त्र (त्रिचीवर),

  1. कमर में बांधने के लिए एक पेटी (कटिबांधनी),

  2. एक भिक्षापात्र,

  3. एक उस्तरा (वाति),

  4. सुई-धागा, और

  5. पानी साफ करने की एक छलनी या छन्ना (अलक्षाधक)।

इसके अलावा एक भिक्षु के लिए सोने या चांदी को प्राप्त करना पूर्णतया निषिद्ध है, क्योंकि उससे यह आशंका होती है कि सोने या चांदी से वह उन आठ वस्तुओं के अलावा, जिनको रखने की उसे अनुमति है, कुछ और वस्तुएं खरीद सकता है।

ये नियम रूस में साम्यवाद में पाए जाने वाले नियमों से बहुत अधिक कठोर हैं। साधन

अब हम साधनों पर आते हैं। साम्वाद जिसका प्रतिपादन बुद्ध ने किया, उसे कार्यान्वित करने के लिए साधन भी निश्चित थे इस साधनों को तीन भागों में रखा जा सकता हैः

भाग एकµ पंचशील का आचरण। बुद्ध ने एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया । यह उन समस्याओं की कुंजी है, जो उनके मन में बार-बार उठा करती थीं।

नए सिद्धांत का आधार यह है कि यह सारा संसार कष्टों और दुःखों से भरा हुआ है। यह एक ऐसा तथ्य था जिस पर न केवल ध्यान देना आवश्यक था, बल्कि मुक्ति की किसी भी योजना में इसे प्रथम स्थान देना था। इस तथ्य को मान्य कर बुद्ध ने इसे आपने सिद्धांत का आधार बनाया।

उनका कहना था कि उक्त सिद्धांत को यदि उपयोगी होना है, तो कष्ट तथा दुरुख का निवारण हमारा लक्ष्य होना चाहिए।