सुधारक और उनकी नियति
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इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ से इस शिक्षक और हृदय जीतने वाले का तेजस्वी
और आकर्षक व्यक्तित्व उभरता है। कोई भी व्यक्ति उनकी तरह भगवान न
होते हुए भी भगवान जैसा ही रहा। देवता होने का झूठा दावा नहीं किया,
भविष्य के सुख से निस्पृह, अनासक्त, वैराग्य, विचारों में युगांतरकारी लेकिन
संसार की मूर्खता की प्यार से उपेक्षा करते हुए, उच्च लेकिन बहुत पसंद
किए जाते थे, विश्व-बंधुत्व भाव से संपन्न वह लोगों में साधारण और शांत
रूप से घूमते थे, मधुर से मधुरतम वाणी, सभी के आदर्श, सभी से मित्र
भाव। उनका स्वर सम्मोहक और पटु था, उनकी आवाज श्रोता को उनका
कायल बना देती थी, उनका दर्शन पे्ररणादायक था। परंपरा से ऐसा लगता है
कि वे उनमें से एक होंगे, जिनका व्यक्तित्व ही आदमी को न केवल नेता,
बल्कि साथियों के हृदय में भगवान बना देने के लिए काफी था। जब ऐसा
कोई बोलता है, तो वह श्रोता को वश में कर लेता है। इससे कोई फर्क नहीं
पड़ता कि वह क्या कहते हैं, क्योंकि वह गति को प्रभावित करते हैं और जो
भी उनको सुनता है, वह नत-मस्तक हो जाता है। इस व्यक्तित्व के अलावा,
दूसरों के मन में यह भावना आती है कि जो भी शिक्षा वह देता है, वह
सामान्य नहीं है, बल्कि लोगों की मुक्ति की एक आशा की किरण है, पहली
बार उनके शब्दों में सच्चाई पाते हैं जिससे गुलाम एक स्वतंत्र आदमी बन
जाता है, वर्गों में भाईचारा पैदा होता है। तब ये देखना मुश्किल नहीं है कि
बिजली जैसा स्फूर्ति कहां से उपजती और कैसे एक हृदय से दूसरे हृदय में
प्रवाहित होती है। ऐसे आदमी थे बुद्ध, ऐसी उनकी शिक्षाएं थीं, और ऐसी ही
अपरिहार्य तीव्रता से बौद्ध धर्म फैला और इस नए मत ने लोगों की नैतिक
चेतना पर गहरा प्रभाव डाला।य्
बुद्ध ने जब अपना अभियान शुरू किया और उनकी शिक्षा से जो महान सुधार आया, उसको समझने से पहले तत्कालीन आर्य सभ्यता की विकृत स्थिति को जानना आवश्यक है।
तत्कालीन आर्य समुदाय सबसे घृणित सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक व्यभिचार में फंसा हुआ था।
कुछ सामाजिक बुराइयां बताने का एक उदाहरण है, जुआ खेलना। आर्यों में शराब पीने की आदत की तरह जुआ भी समाज में व्यापक रूप से फैला हुआ था।
प्रत्येक राजा के यहां जुआ खेलने के लिए महल के साथ ही एक मंडप हुआ करता था। हर एक राजा जुए के विशेषज्ञ को नौकरी पर रखते, जो खेल के समय राजा का सहायक हुआ करता था। सम्राट विराट की सेवा में कंक जैसा जुआ विशेषज्ञ नौकरी करता था। जुआ राजाओं के केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं था। वे बड़े दांव लगाकर