4. सुधारक और उनकी नियति - Page 35

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आवश्यक है। जब भी समय के अनुसार आवश्यक हुआ, उन्होंने उन

लोगों से शांतिपूर्वक संबंध-विच्छेद कर लिया, जो संघ का अहित करते

थे। उन्होंने शारीरिक कष्ट धैर्य से सहा, लेकिन फिर भी आंतरिक सुख

में कमी नहीं हुई। साहस की आवश्यकता थी जो उनमें पाया गया,

उदाहरण के लिए, देवदत्त के द्वारा उनकी हत्या के कई प्रयासों और

हत्या की धमकियों के बावजूद, वे शांतचित्त बने रहे। कौशल राज्य

के प्रसिद्ध डाकू का राज्य के गांवों में आतंक था। उस डाकू से बुद्ध

अकेले और बिना अस्त्र के मिलने गए तथा उसका हृदय परिवर्तन

किया और इस प्रकार लोक-कंटक से बदलकर उसे संघ का शांतिप्रिय

सदस्य बना लिया। कष्ट, खतरे और अनादर उनकी आध्यात्मिक शांति

को भंग नहीं कर पाए। जब उन्हें गाली दी गई, तो उन्होंने जवाब में

गाली नहीं दी। जिनको सांत्वना व सहयोग की आवश्यकता थी, उनके

लिए उनकी तरफ से कोमल सहृदयता की कमी नहीं थी।य्

वह सबको प्रिय थे। बार-बार उनका वर्णन किया जाता है या वह स्वयं वर्णन करते है कि उन्होंने लोगों की भलाई के लिए, लोगों की खुशी के लिए, लोगों के लाभ के लिए, भगवान और इंसान की अच्छाई और खुशी और समग्र विश्व से सहानुभूति के लिए जन्म लिया है।

उन्होंने आर्यों के समाज पर अमिट छाप छोड़ी है। यद्यपि उनका नाम भारत के बाहर फैला है, उनकी शिक्षा का प्रभाव अभी तक यहां बना हुआ है।

उनका धर्म बड़ी तेजी से फैला। जल्दी ही यह सारे भारत का धर्म बन गया। लेकिन यह भारत तक ही सीमित नहीं रहा। यह तत्कालीन विश्व के कोने-कोने तक पहुंच गया। हर नस्ल के लोगों ने इसे स्वीकार किया। यहां तक कि एक समय अफगान लोग भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। यह एशिया तक ही सीमित नहीं रहा। इस बात के भी प्रमाण मिलते है कि बौद्ध धर्म ब्रिटेन तक फैला हुआ था। ख्1,

बौद्ध धर्म के इतनी तेजी से फैलने के क्या कारण थे?

इस बारे में प्रोफेसर होपकिन्स का कथन उद्धृत करने योग्य है। उन्होंने कहा हैः

फ्प्रारंभ से बौद्ध धर्म के तेजी से प्रसार का कारण उसकी शिक्षा तथा

उसकी नींव डालने वाले के प्रभावोत्पादकता और प्रश्रय में निहित है। बुद्ध

ने लोगों को मोहित कर दिया, उनकी शिक्षा ने उत्साह जगाया, अभिजात के

रूप में उनकी जो स्थिति थी, उसने उन्हें अभिजात वर्ग में सम्मानित बनाया,

उनमें विद्यमान चुंबकीय आकर्षण ने उन्हें लोगों का भक्ति-भाजन बनाया।

  1. बुद्धिज्म इन प्री-क्रिश्चियन ब्रिटेन, डॉ. डोनाल्ड ए. मेकेन्जी, ब्लेकी एंड सन, लंदन, 1928