सुधारक और उनकी नियति
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मरी जा रही है। इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि केवल रानियां ही शराब पीती थीं। शराब पीने की आदत हर वर्ग की महिलाओं में सामान्य बात थी और यहां तक कि ब्राह्मण महिलाएं भी इस आदत से बची हुई नहीं थीं। ख्1, आर्य महिलाएं शराब पीती थीं और नृत्य करती थीं, यह कौसीतकी गृह्य सूत्र (1.11-12) से स्पष्ट है, जिसमें कहा गया है, ‘चार या आठ सधवा महिलाएं शराब और भोजन का सेवन कर लेने के बाद वैवाहिक समारोह से पहले की रात में चार बना नाचेंगी।’
अब आर्यों के समाज की बात करें जोकि वर्ग-संघर्ष और वर्ग अप्रतिष्ठा का शिकार था। आर्यों का समाज चार वर्गों को मान्यता देता है। वे हैंµब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इनमें विभेद केवल धरातल का नहीं था, सामाजिक संबंधों में से एक-दूसरे के बराबर थे। ये विभेद ऊंच-नीच का था, एक वर्ग दूसरे के ऊपर था। एक-दूसरे के ऊपर या नीचे होने के कारण चारों वर्णों में ईर्ष्या और विद्वेष था। इस ईर्ष्या और विद्वेष से शत्रुता पैदा हुई। यह शत्रुता दो सर्वोच्च वर्गों, अर्थात ब्राह्मण और क्षत्रियों में अधिक थी। इन दोनों में सतत् वर्ग-संघर्ष चलता रहता था। यह इतना तीव्र था, जिसका विवरण पढ़कर मार्क्सवादी प्रसन्न हो जाएंगे। दुर्भाग्य से ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच के वर्ग-संघर्ष का विस्तृत इतिहास नहीं मिलता है। केवल कुछ उदाहरण लिखे गए हैं। वेन, पुरुरवा, नहुष, सुदास, सुमुख और निमि ऐसे क्षत्रिय राजा थे, जिनका ब्राह्मणों से संघर्ष हुआ था। इन संघर्षों के मुद्दे अलग-अलग थे।
वेन और ब्राह्मणों के बीच मुद्दा यह था कि क्या राजा का प्रभुत्व रहेगा और ब्राह्मण उसकी पूजा करेगा और भगवान को बलि चढ़ाने की बजाय वह राजा को बलि चढ़ाएगा। पुरुरवा और ब्राह्मणों के बीच मुद्दा यह था कि क्या राजा ब्राह्मणों की संपत्ति जब्त कर सकता है या नहीं। नहुष और ब्राह्मणों के बीच मुद्दा यह था कि क्या क्षत्रिय राजा ब्राह्मण से गुलामों जैसा कार्य करवा सकता है। निमि और ब्राह्मणों के बीच मुद्दा यह था कि क्या बलि समारोह के लिए वह परिवार के पुरोहित की सेवाएं लेने को बाध्य था। सुदास और ब्राह्मणों के बीच मुद्दा यह था कि क्या पुरोहित के पद के लिए वह केवल ब्राह्मण की सेवाएं लेने को बाध्य था।
इससे ज्ञात होता है कि इन दोनों वर्गों के बीच कितने बड़े मुद्दे थे। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इनके बीच संघर्ष सबसे अधिक कटु था। इनके बीच संघर्ष
- निम्न वर्ग की महिलाओं की क्या कहें, सातवीं और आठवीं शताब्दी में आर्याव्रत के मध्य क्षेत्र में ब्राह्मण महिलाएं शराब पिया करती थीं, जो कुमारिल भट्ट की तंत्र-वर्तिका (1.3-4) से स्पष्ट है, जिसमें कहा गया है कि ‘आधुनिक दिनों के लोगों में हम पाते हैं कि अहिछत्र तथा मथुरा देश की ब्राह्मण महिलाएं शराब पीने की आदी हैं।’ कुमारिल ने केवल ब्राह्मणों की पीने की आदत की निंदा की है। लेकिन क्षत्रियों और वैश्यों की पीने की निंदा नहीं की है, यदि शराब फल या फुलों से अर्थात माधवी और शीरे की हो, न कि अनाजों से बनी सुरा।