परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 148

परिविष्ट-1 133

‘‘मैं इस प्राचीन देव को सम्बोधित करूंगा, मेरी नई स्तुति, जिसकी उसे इच्छा है उसे वह सुने।’’

‘‘हम अश्वों, पशुधन और सम्पदा की कामना से तेरा आह्वान करते हैं।’’

इतने साक्ष्य प्रस्तुत करने पर यह सिद्ध होता है कि वेदों की रचना मनुष्य ने की है जबकि ब्राह्मणें ने कंठशक्त से यह प्रचारित किया कि वेद मानव-रचित नहीं हैं जो एक पहेली है। ब्राह्मणों द्वारा यह प्रचार किस उद्देश्य से किया गया?

III

वेदों की सत्ता क्या है? हिंदुओं में इसके संबंध में दो भिन्न मान्यताएं हैं। पहली यह कि वेद सनातन हैं। इस मान्यता की विवेचना न कर हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं क ऐसे मत का औचित्य क्या है? यदि हिंदुओं को विश्वास है कि वेद विश्व के प्राचीन रचित ग्रंथ हैं तो इस पर कोई विवाद नहीं कर सकता। परन्तु इस अद्भुत विचार को युक्तिसंगत ठहराने का कोई आधार नहीं है कि ये अनादि हैं। एक बार यह प्रमाणित हो जाने पर कि ऋषि वेदों के सृष्टा हैं तो यह प्रमाणित करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती कि वेदों का आरम्भ उस काल से मेल खाता है, जब ऋषि हुआ करते थे। यह कहने से कि ऋषि वेदों के सृष्टा हैं यह मान्यता अनर्गल है कि वेद सनातन हैं।

इस मान्यता को जीवित रखने के लिए जो तर्क दिए गए हैं वे भी हास्यास्पद ही हैं।

सर्वप्रथम, यह उल्लेखनीय है कि यह मान्यता निराधार है कि वेदों की रचना परमात्मा ने की है। यह विश्वास नैयायिकों ने जमाया। परन्तु ऐसा लगता है कि पूर्व मीमांसा के प्रणेता जैमिनि के विचारों की हिंदुओं में मान्यता है और वे इस बात के पक्ष में नहीं हैं। मीमांसकों का यह उद्धरण उल्लेखनीय है।

‘‘किन्तु (मीमांसक पूछता है) अमूर्त परमेश्वर ने किस प्रकार वेदों को अभिव्यक्त किया? जिसका तालु और उच्चारण का अन्य अंग नहीं है। इस कारण यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसने शब्दों का उच्चारण किया होगा। यह प्रयास (नैयायिक का उत्तर) मान्य नहीं है। क्योंकि परमेश्वर अमूर्त है फिर भी अपने भक्तों को कृतार्थ करने हेतु वह रूप धारण कर सकता है, इस प्रकार यह तर्क कि वेद पौरुषेय नहीं है खण्डनीय है।

‘‘मैं अब (मींमासक कहता है) कि इन संदेहों का निराकरण करता हूं कि इस पौरुषेयत्व का क्या अर्थ है, जिसे प्रमाणित करना है। इसका तात्पर्य है, (1) किसी पुरुष द्वारा उत्पत्ति, जैसे हमारे द्वारा वेदों की उत्पत्ति, जब हम इनका दैनिक पाठ करते