परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 151

136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘ध्वनि करना’’ का अर्थ है एक क्रिया अथवा ‘‘उच्चारण’’। जैसे सूर्य का दर्शन एक साथ अनेक व्यक्ति करते हैं, वैसे ही ध्वनि भी एक साथ अनेक व्यक्तियों द्वारा सुनी जाती है। ध्वनि सूर्य की भांति सर्वव्यापी है। यह कोई सूक्ष्म तत्व नहीं है। इसलिए सभी को समान रूप से ग्राह्य है चाहे कोई निकटस्थ हो अथवा दूरस्थ।’’

‘‘सूत्र 10 में वर्णित है कि ‘‘इ’’ स्वर ‘‘ई’’ में परिवर्तित हो जाता है। वह ‘‘इ’’ का रूपांतरण नहीं है बल्कि ‘‘ई’’ एक भिन्न स्वर है। परिणाम निकलता है कि ध्वनि का रूपांतरण नहीं होता।’’

‘‘जब कई व्यक्ति समवेत स्वर में बोलते हैं तो कोलाहल ही बढ़ता है, स्वर वही रहता है। कोलाहल का अर्थ है भिन्न-भिन्न दिशाओं से वायु के संयोजन-वियोजन का एक साथ कानों में प्रवेश। इसी कारण उसका विस्तार होता है।’’

‘‘ध्वनि सनातन होनी चाहिए क्योंकि वह अन्य लोगों तक अर्थ प्रेषित करती है। यदि वह सनातन न होती तो जब तक श्रोता उसका भाव जानता, तब तक वह उपस्थित ही न रहती और इस प्रकार श्रोता भाव-ग्रहण करने से वंचित रह जाता क्योंकि वह उपस्थित ही नहीं रहती।’’

‘‘ध्वनि सनातन है क्योंकि वह सदैव सही और समान होती है और अनेक व्यक्ति उसे एक साथ समान रूप से सुनते हैं और यह नहीं माना जा सकता कि वे सभी गलती करें।’’

‘‘यदि ‘गौ’ (गाय) शब्द को 10 बार दोहराएं तो श्रोता कहेंगे कि दस बार ‘‘गौ’’ कहा गया है। वे यह नहीं कहेंगे कि ‘‘गौ’’ की ध्वनि के दस शब्द कहे गए हैं। इस प्रकार यह ध्वनि की शाश्वतता का एक और प्रमाण है।’’

‘‘ध्वनि सनातन है, क्योंकि हमारे पास यह मानने के लिए कोई आधार नहीं है कि इसका क्षय हो जाता है जैसा कि सूत्र 20 में।’’

‘‘परन्तु यह कहा जा सकता है कि ध्वनि वायु का रूपांतरण है क्योंकि इसका उद्गम वायु का संयोजन है क्योंकि शिक्षा (वेदांग) का कथन है कि ध्वनि के अनुरूप हवा निकलती है और इस प्रकार यह वायु से उत्पन्न होती है। इसलिए सनातन नहीं हो सकती।’’

इस आपत्ति का निराकरण सूत्र 22 में किया गया हैः

‘‘ध्वनि वायु का रूपांतरण नहीं है। यदि ऐसा होता तो श्रवणेंद्रिय के समक्ष कोई संगत तत्व न होता।’’