परिविष्ट-1
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इस न्यायबद्ध सार को देखते हुए कि ‘‘ध्वनि सनातन है और वेद के शब्द भी ध्वनि हैं, इस कारण वेद भी सनातन हुए’’ हम तर्कों की कीचड़ में फंसना नहीं चाहते। आश्चर्य यह है कि ब्राह्मणों ने वेदों के सनातन होने का यह सिद्धांत क्योंकर प्रचारित किया? अपने सिद्धांत के समर्थन में उन्होंने ऐसे अनाप-शनाप तर्क क्यों गढ़ डाले? ब्राह्मणों ने यह स्वीकार क्यों नहीं कर लिया कि वेद ब्रह्मवाक्य नहीं है?
वेदों की सत्ता के विषय में दूसरी मान्यता यह है कि वे मात्र पावन और पवित्र ही नहीं हैं बल्कि वे संशय-रहित हैं।
यह समझना कठिन है कि ब्राह्मणों ने वेदों को संशय-रहित बताने के प्रयास क्यों किए?
नियमों के संदर्भ में वेदों में कोई अटल भाव नहीं है। वेदों में धर्म कौ नैतिक भावना प्रदान नहीं की। वेदों के तीन अंशों को मुश्किल से ही नैतिक परिधि में ढाला जा सकता है।
पहला यम-यमी संवाद है जो भाई-बहन थेः
‘‘यमी ने यम से कहा कि मैं तुझे प्रणय-निमंत्रण देती हूं। हम अविरल पारावार से निकल कर इस भूखंड के सूनेपन में अकेले हैं, तू मुझे अपना प्रणय सुख दे।’’ यम को बहन से सहवास करने की इच्छा नहीं थी, उसने कहा, ‘‘तेरा प्रिय तुझसे प्रणय का इच्छुक नहीं है क्योंकि हम दोनों सहोदर हैं।’’ तब यमी बोली, ‘‘सभी अनश्वर संसार का आनन्द लूटते हैं। नश्वरों को यह सुख उपलब्ध नहीं होता। तू मुझसे वैसे ही संसर्ग कर जैसे विधाता ने अपनी पुत्री से किया था। तू मेरी देह से वही आनन्द लूट।’’ यम ने पलटकर उत्तर दिया ‘‘जो अतीत में हो चुका है, हमें वैसा नहीं करना चाहिए क्योंकि हम सत्यवादी हैं। असत्य कैसे कहेंगे?’’ यमी आतुर थी। वह बोली, ‘‘जो परम स्वरूप है, उसी देव ने गर्भ में ही हमारी रचना मिथुन-युगल के रूप में की है, भला उसी इच्छा के विपरीत कोई जा सकता है! धरती और आकाश हमारा मिलन देखने को आतुर हैं।’’ यम सहमत नहीं हुआ। आरम्भ की बात कौन जानता है और कौन बता ही सकता है? परन्तु यमी का मन नहीं मान रहा था। उसने फिर कहा, ‘‘मेरी इच्छा तुमसे सहवास की हो रही है। तू उसे पूरा कर, मैं अपने प्रियतम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती हूं। हमारा मिलन होना ही चाहिए, वैसे ही जैसे रथ के दो पहिए होते हैं। ‘‘यम ने यमी को समझाया’’ परमात्मा ने धरती पर अनेक जीव बनाए हैं, तू मेरे सिवाय किसी को भी अपना ले और उसी प्रकार चल जैसे रथ के दो पहिए चलते हैं। फिर यम ने यह भी समझाया कि अब वह समय आ गया है कि बहन उसी को पति चुनेगी, जो उसका भाई नहीं होगा। इसलिए हे शुभे, किसी अन्य का हाथ थाम और आनन्द ले।’’ यमी ने कातर होकर कहा, ‘‘क्या वह भी