परिशिष्ट - 2
वेदांत की पहेली
प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने षट्दर्शन का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया है, उसमें वास्तव में सबसे विख्यात है वेदांत दर्शन। केवल नाम के कारण ही नहीं, बल्कि हिंदुओं में इसकी जितनी मान्यता है, उतनी अन्य दर्शनों की नहीं। वेदों के प्रत्येक अनुयायी को वेदांत पर गर्व है। वह केवल इसको मानता ही नहीं बल्कि वह यह भी समझता है विश्व को दार्शनिक विचारों के योगदान में यह सर्वाधिक मूल्यवान है। वह समझता है कि वेदांत-दर्शन वेदों की शिक्षा का लक्ष्य है। उसे कभी भी यह संदेह नहीं हुआ कि भारत के इतिहास में वेदांत कभी वेद-द्रोही रहा है अथवा उसमें वेदों का खण्डन किया गया है। उसे इस बात का कभी विश्वास नहीं होता कि एक समय ऐसा भी था, कि उसका अर्थ वर्तमान अर्थ से पूर्णतः भिन्न था, जिनके अनुसार वेदांत का अर्थ यह किया जाता था कि इसमें वैदिक विचारों की उपज है और यह ऐसे विचारों का साकार रूप है जो वैदिक साहित्य के अधिमत की परिधि से बाहर है। वास्तव में यही बात थी।
यह सत्य है कि वेदों और वेदांत के बीच यह विचार भिन्नता ‘उपनिषद’ शब्द से परिलक्षित नहीं होती थी, जो उस साहित्य की व्यापक पहचान है जो वेदांत-दर्शन ने प्रचलित किया और जिसकी व्युत्पति के विषय में बहुत मतभेद हैं।
अधिकांश यूरोपीय विद्वान इस बात पर सहमत हैं कि उपनिषद् की व्युत्पति ‘‘षद्’’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है, बैठना। इसके पश्चात् ‘‘नि’’ का अर्थ है ‘नीचे’ और ‘‘उप’’ का अर्थ है, पास, जिसके कारण इसका सम्पूर्ण अर्थ निकलता है, किसी एक व्यक्ति के पास सामूहिक रूप में जाकर बैठना। जैसा कि प्रोफेसर मैक्समूलर ने कहा है, इस व्युत्पति के संबंध में दो आपत्तियां हैं। पहली बात तो यह है कि ऐसा लगता है कि इसका आशय उपनिषद सहित इसके अन्य भागों से है और इसकी कभी व्याख्या नहीं की गई कि उसका अर्थ इतना सीमित क्यों निकाला गया?
मूल अंग्रेजी में ‘वेदांत की पहेली’ शीर्षक से 21 पृष्ठों की टंकित प्रति प्राप्त हुई थी। यह अध्याय पूर्ण लगता है और लेखक द्वारा कोई संशोधन नहीं किया गया है। - संपादक