परिशिष्ट-2: वेदांत की पहेली - Page 165

150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

रूप पंचमवेद, वेदों का वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, कलानिधि शास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, शिक्षाकल्प, छन्द और चितिरूप ब्रह्मविद्या, भूतशास्त्र, धनुर्वेद, ज्योतिषविद्या, गारुड़विद्या, नृत्य, यह सब मैं जानता हूं। (3) यह सब जानते हुए भी वह मैं केवल शब्दार्थ मात्र ही जानता हूं, आत्मा को मैं नहीं जानता। मैंने आप पूज्यजनों जैसे महापुरुषों से सुना है आत्मज्ञानी शोक को पारकर जाता है। मैं तो शोक करता हूं। ऐसे शोकग्रस्त मुझे शोक से पारकरें, अर्थात् मुझे अभय प्राप्त कराएं। ऐसा सुनकर सनत्कुमार ने नारद से कहा- अभी तक यह जो कुछ तुम जानते हो वह नाममात्र ही है, (4) क्योंकि ऋग्वेद नाम है, यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्वण वेद, पांचवां वेद इतिहास पुराण, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पात ज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेद विद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड़, विद्या संगीतादि कला और शिल्पशास्त्र - ये सब भी नाम ही हैं। (अतः प्रतिमा में विष्णु बुद्धि के समान) तुम नाम की ब्रह्म बुद्धि से उपासना करो। (5) वह जो नाम ब्रह्म है, ऐसी उपासना करता है, जहां तक नाम की गति है, वहां तक नाम के विषय में उस उपासक की यथेष्ट गति हो जाती है। जो ‘‘यह ब्रह्म है’’ इस प्रकार नाम की उपासना करता है। नारद ने कहा, ‘क्या नाम से बढ़कर भी कोई वस्तु है? सनत्कुमार ने कहा, नाम से भी बढ़कर वस्तु है। तब नारद ने कहा, मुझे उसका ही उपदेश करें।’’

बृहदारण्यक उपनिषद् कहता हैः

इस (सुषुप्तावस्था में) पिता, पिता नहीं होता है, माता, माता नहीं होती है, अर्थात् वहां जन्य भाव संबंध नहीं रह जाता। लोक, अलोक हो जाते हैं। देव, देव नहीं और वेद, वेद नहीं हो पाते हैं, अर्थात् सभी साध्य-साधन का अभाव हो जाता है। यहां पर चोर, चोर नहीं होता है। भ्रूण हत्यारा, अभ्रूणहत्यारा हो जाता है। चांडाल-चांडाल नहीं रह जाता है। पौल्कस, पौल्कस नहीं हो पाता है। परिव्राजक अपरिव्राजक और वानप्रस्थी अतापस हो जाता है। इस समय संत (प्राणी) का लाभ या हानि से कोई संबंध नहीं रह जाता, न गुण से, न पाप से, क्योंकि तब वह हृदयस्थ समस्त दुखों को विस्तृत कर जाता है।

कठोपनिषद का मत निम्न प्रकार से हैः

‘‘आत्मा उपदेश से प्राप्त नहीं। न ही ज्ञान से, न पठन-पाठन से। वह उसी को प्राप्त होती है जिसे वह चाहे। आत्मा उसी शरीर में वास करती है जिसे वह चुन लेती है।’’

‘‘यद्यपि आत्मा का ज्ञान कठिन है तथापि समुचित साधनों से उसे जाना जा सकता है। वह (लेखक) कहता है इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे न तो उपदेश से, न वेदों के ज्ञान से, न बुद्धि से, न पुस्तकों के रखने से, न मात्र पठन-पाठन से। फिर वह कैसे प्राप्य हो, वह यह कहता है?’’

उपनिषदों में कितनी प्रतिकूलता है और इनकी दार्शनिकता कितनी असंगत है,