परिशिष्ट-2: वेदांत की पहेली - Page 166

परिविष्ट-2

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इसका आभास तभी हो सकता है जब कोई हिंदुओं की विवाह-पद्धति ‘अनुलोम’ और ‘प्रतिलोम’ शब्दों का उत्पत्ति समझेगा। उसकी उत्पत्ति के विषय में काणे का कथन हैः ख्1,

‘‘अनुलोम और प्रतिलोम (विवाह की परम्परा) ये दोनों वैदिक साहित्य में दुर्लभ हैं। बृहदारण्यक उपनिषद ( II,1.15) और कौषीतकि बृहदारयण्क उपनिषद IV, 18 में ‘प्रतिलोम’ शब्द का प्रयोग उस स्थिति के लिए किया गया है, जब कोई ब्राह्मण ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्षत्रिय के पास जाए।’’

अनुलोम का अर्थ है, शास्त्रानुसार सहज परम्परा से कार्य सम्पन्न होना, प्रतिलोम का अर्थ है, सहज परम्परा के विपरीत। श्री काणे के कथनानुसार प्रतिलोम की परिभाषा के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि उपनिषदों को वैदिक साहित्य की मान्यता नहीं है। उन्हें यदि तिरस्कृत भी नहीं किया गया है तो भी वैदिक ब्राह्मणों ने उनका स्थान तुच्छ रखा है। यह समझना एक पहेली है कि ब्राह्मण, जो वेदांत के विरोधी थे, कालातीत में वही उसके समर्थक और पक्षधर क्यों बन गए।

II

यह वेदांत की एक पहेली है। एक अन्य बात भी है, केवल वेदांती ही वेद विरोधी नहीं हैं। न वे यह मानते हैं कि मोक्ष का साधन कर्मकाण्ड है। सर्व दर्शन संग्रह के लेखक माधवाचार्य ने वेदों के दो विरोधियों का जिक्र किया है वे हैं चार्वाक और बृहस्पति। वैदिकों पर उनकी आलोचना अधिक तार्किक है। निम्नांकित उद्धरण से चार्वाक का विरोध परिलक्षित होता है जो उन्होंने वेद के विरोध में कहा है। ख्2,

‘‘यदि आपको इस पर आपत्ति है, यदि परलोक में सुख जैसा कुछ नहीं तो बुद्धिमान अग्निहोत्र क्या करें? बल क्यों दे? जिन पर भारी अपव्यय होता है और थकान होती है? आपकी आपत्ति को कोई भिन्न साक्ष्य नहीं माना जा सकता क्योंकि अग्निहोत्रादि जीविकोपार्जन के साधन मात्र हैं। क्योंकि वेद में तीन दोष हैं। अर्थात् मिथ्या-कथन, अन्तर्विरोध और पुनरुक्ति। तब फिर छद्म वेशी जो स्वयं को वैदिक पंडित मानते हैं, तथा परस्पर संघर्षरत रहते हैं, उनमें ज्ञान मार्गी कर्मकांडियों की मान्यताओं को असत्य ठहराते हैं और कर्मकांडी ज्ञान मार्गियों की मान्यताएं ठुकरा देते हैं, अंततः तीनों वेद पोंगापंथियों के असंगत चारण काव्य के रूप में रह जाता है। इस संबंध में प्रसिद्ध लोक-कथन इस प्रकार हैं-

‘‘अग्निहोत्र, तीनों वेद, तापस के तीन-पद और भस्म रमाकर कुरूप होना,’’

  1. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, खंड 2, भाग 1, पृ. 52

  2. सर्व दर्शन संग्रह (कावैल द्वारा अनूदित), पृ. 64