152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ये बृहस्पति के कथनानुसार उनकी कमाई के धंधे हैं जो मनुष्यता तथा बुद्धि रहित हैं।
बृहस्पति वेदों के विरोध में अधिक साहसी एवं उग्र थे, जैसा कि माधवाचार्य ने उद्धृत किया है। बृहस्पति का तर्क ख्1, हैः
स्वर्ग की कोई सत्ता नहीं है, मोक्ष कुछ नहीं है। न ही पुनर्जन्म होता है। न चार जातियों के कर्म, क्रम आदि कोई वास्तविक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। अग्निहोत्र, तीनों वेद, तापस के तीन पद, और शरीर पर भस्म ईश्वर ने उनकी कमाई का साधन बनाया जो ज्ञान और पौरुष विहीन हैं। ज्योति स्तोम संस्कार में, यदि कोई जीव काट दिया जाता है और यदि वह सीधे स्वर्गगामी होता है तो बलिदाता अपने पिता की बलि क्यों नहीं दे देता?
यदि श्राद्ध से परलोक संतुष्ट होते हैं तो इहलोक में भी जब कोई यात्रा आरम्भ करता है तो यात्रा प्रबंध करना व्यर्थ है।’’
यदि श्राद्ध से परलोक में संतुष्टि होती है तो इहलोक में उन्हें भोजन क्यों नहीं दिया जाता जो स्वर्ग से विमान आने की प्रतीक्षा में बैठे हैं।
जब तक जीवन है तो सुख से क्यों न रहें। क्यों न ऋण लेकर भी घी पिएं।
यदि मरणोपरांत देह भस्म बन जाती है तो वापस कैसे आ सकती है?
देह त्याग के पश्चात् कोई यदि परलोक चला जाता है तो वह अपने परिजन के मोह में फंसकर लौट क्यों नहीं आता?
इस प्रकार सब कमाई के धंधे हैं जो ब्राह्मणों ने बना रखे हैं।
ये सभी संस्कार मृतकों के लिए हैं अन्यत्र इनसे कोई फल नहीं मिलता, तीनों वेदों के सृष्टा विदूषक और दुरात्मा हैं।
पंडितों, झारपड़ी, तुरपड़ी के सर्वविदित सूत्र और देवी के लिए परोक्ष पूजा सभी अश्वमेघ की प्रशंसा में हैं।
इनका अन्वेषण इन्हीं विदूषकों ने किया और इसी कारण पुरोहितों को विभिन्न प्रकार से चढ़ावा मिल जाता है।
जबकि इसी प्रकार निशाचरों ने मांस-भक्षरण की प्रशंसा की है।
वैदिक ब्राह्मणों और वेदांतियों ने किस प्रकार सांठ-गांठ हो गई, परन्तु उन्होंने चार्वाक और बृहस्पति को क्यों स्वीकार नहीं किया? इस पहेली का उत्तर नहीं मिलता।
- सर्व दर्शन संग्रह, पृ. 10