154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लोगों के विरुद्ध है जो वेदांत ख्1, में आस्था रखते हैं_
‘‘विदेह राजा जनक ने यज्ञ किया जिसमें उदारतापूर्वक दक्षिणा दी गई (बृह. 3.1.1.), ‘‘मान्यवर! मैं बलि दे रहा हूं (छांदो. 5.11.5) जनक और अश्वपति दोनों ही आत्मज्ञानी थे। यदि वे दोनों ही आत्मज्ञानी थे तो वे मुक्ति पा चुके थे। फिर यज्ञ करने की आवश्यकता ही नहीं थी, परन्तु दोनों प्रसंगों में कहा गया है कि उन्होंने यज्ञ किया। इससे प्रमाणित होता है कि मुक्ति तभी मिल सकती है जब यज्ञ किया जाए और जैसा कि वेदांती कहते हैं, मुक्ति आत्मज्ञान से प्राप्त नहीं होती।’’
जैमिनि ने एक रचनात्मक बात कही है कि शास्त्रों में निरापद कथन ख्1, है ‘‘आत्मज्ञान यज्ञ की अपेक्षा गौण है।’’ जैमिनि इसे उचित ख्2, बताते हैं कि दोनों (ज्ञान और कर्म) समानांतर चलते हैं (मृत आत्मा को फल देने हेतु)। जैमिनि बादरायण के ज्ञानकांड को स्वतंत्र साधन नहीं मानते। वे इसके दो आधार बताते हैं। प्रथम ‘‘आत्म-ज्ञान स्वतः कोई फलदायी नहीं।’’ द्वितीय ‘‘वेदों की सत्ता के अनुसार ज्ञान कर्म की अपेक्षा गौण है।’’
बादरायण के ज्ञान-कांड पर जैमिनि की क्या स्थिति है? उनका उल्लेख बादरायण ने अपने सूत्रों 8-17 में किया है।
पहला ख्3, मत है कि जैमिनि ने जिस ‘‘आत्मा’’ का जिक्र किया है, वह सीमित आत्मा है अर्थात् आत्मा और परमात्मा भिन्न है और शास्त्रों में परमात्मा को मान्यता है।
बादरायण का दूसरा ख्4, मत है कि वेद आत्मज्ञान के पक्षधर हैं और वेदों की यज्ञ में भी आस्था है।
बादरायण का तीसरा मत ख्5, है कि जिनकी वेदों में निष्ठा है, उन्हें ही यज्ञ की अनुमति है। परन्तु जो उपनिषदों के अनुगामी हैं, उन पर यह निर्देश लागू नहीं। जैसी कि शंकराचार्य ने व्याख्या की हैः
‘‘जिन्होंने वेद पढ़े हैं और जो कर्मकांड के ज्ञाता हैं वे यज्ञ करा सकते हैं। उनके लिए यज्ञ कराना निषिद्ध है, जिन्होंने उपनिषदों से आत्मज्ञान अर्जित किया है। ऐसे ज्ञान की कर्मकांड से कोई तुलना नहीं।’’
बादरायण का चौथा मत ख्6, है कि जन्हें ब्रह्मानंद प्राप्त है, उनके लिए कर्मकांड वैकल्पिक है। जैसा कि शंकराचार्य ने स्पष्ट किया हैः
‘‘कि कुछ लोगों ने स्वतः ही कर्मकांड का त्याग कर दिया है। बात यह है कि
बादरायण सूत्र 4
देखें बादरायण सूत्र 5
बादरायण सूत्र 6, शंकर की टिप्पणी।
बादरायण सूत्र 7, शंकर की टिप्पणी।
देखिए बादरायण सूत्र 8
देखिए बादरायण सूत्र 8