परिविष्ट-2
155
ज्ञान प्राप्ति के उपरांत भी कुछ लोग दूसरों के सम्मुख उदाहरण प्रस्तुत करने हेतु कर्मकांड करना पसंद करते हैं, जबकि कुछ उसका परित्याग कर देते हैं। जो आत्मज्ञानी होते हैं, उनके लिए कर्मकांड की बाध्यता नहीं होती।’’
उनकी अंतिम और निर्णायक टिप्पणी ख्1, है किः
‘‘आत्मज्ञान कर्मकांड का प्रतिरोधी है। इसलिए वह कर्मकांड का साधन नहीं है।’’ और इसके समर्थन में वे उन शास्त्रों का सहारा लेते हैं ख्2, जो संन्यास को चौथा आश्रम मानते हैं और संन्यासियों को कर्मकांड द्वारा नियत यज्ञ से मुक्त रखते हैं।
बादरायण के सूत्रों में अनेक ऐसे सूत्र पाए जाते हैं जो दोनों परम्पराओं के विद्वानों के परस्पर विरोधी विचारों को परिलक्षित करते हैं। परन्तु उपरोक्त में से एक ही पर्याप्त है जिसकी अपनी विशेषता है। यदि कोई इस विषय की उपेक्षा कर देगा तो स्थिति विभिन्न हो जाती है। जैमिनि ने वेदांत को मिथ्याशास्त्र, भ्रमजाल और मोहमाया कहकर निंदा की है और उसे सतही, अनावश्यक तथा निराधार बताया है। इस लांछन के विरुद्ध बादरायण ने क्या किया? क्या उन्होंने भी जैमिनि के कर्मकांड को मिथ्याशास्त्र, भ्रमजाल और मोहमाया कहकर निंदा की है और उसे सतही, अनावश्यक तथा निराधार बताया है? उन्होंने मात्र अपने वेदांत शास्त्र का औचित्य ठहराया है। परन्तु उनसे और अधिक अपेक्षा थी। हम अपेक्षा कर सकते थे कि बादरायण भी जैमिनि के कर्मकांड को मिथ्या धर्म कहते। बादरायण में साहस नहीं है। इसके विपरीत वे क्षमाप्रार्थी बनते हैं। वे स्वीकार कर लेते हैं कि जैमिनि का कर्मकांड शास्त्रों पर आधारित है और शास्त्र प्रामाणिक तथा पवित्र हैं जिनका खण्डन नहीं किया जा सकता।
यही इतिश्री नहीं है। बादरायण ने कहा कि उपनिषद् के दो भाव हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि उपनिषद वैदिक साहित्य के अंग हैं। उनका कथन है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वेदांत अथवा ज्ञानकांड, वेदों के कर्मकांड के विरुद्ध नहीं हैं। दरअसल, बादरायण के वेदांत-सूत्र का यही स्वरूप है।
बादरायण का यह सिद्धांत, जो वेदांत सूत्रों का महत्व देता है और जिसके अनुसार उपनिषद वेदों का अंग हैं और वेद तथा उपनिषदों में कोई टकराव नहीं है- यह उपनिषद काल वेद तथा उपनिषद के संबद्ध सूत्रों के विपरीत है। बादरायण का रवैया समझ में नहीं आता। परन्तु यह स्पष्ट है कि बादरायण का मामला एक ऐसे विचित्र और दयनीय व्यक्ति का है जिसने अपना संघर्ष इसी बात को स्वीकार करके प्रारंभ किया कि अपने विरोधी की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया। वेदों में संशयहीनता के संदर्भ में बादरायण ने जैमिनि की सत्ता क्यों स्वीकार कर ली? उसने सत्य का मार्ग क्यों छोड़ा, एक अटल सत्य का साथ। यह ऐसी पहेली है जिसका उत्तर अपेक्षित है।
देखिए बादरायण सूत्र 16
देखिए बादरायण सूत्र 17