परिशिष्ट-3: त्रिमूर्ति की पहेली - Page 173

158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. इन्द्र वृत्तिका इन्द्र

  2. ब्रह्म वृत्तिका ब्रह्मा

  3. देव वृत्तिका देव

  4. दिशा वृत्तिका दिशा

त्रिदेवो के पंथों की उपर्युक्त सूची में विभिन्न देवों के पंथों के साथ तुलना से दो निष्कर्ष निकलते हैं। एक निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मा और महेश की उपासना नई कपोल कल्पना है जो चुल्ल निदेश के बाद आरम्भ हुई। दूसरा निष्कर्ष यह है कि सभी पुरानी आस्थाएं लुप्त हो गईं। इस अद्भुत परिवर्तन का कारण स्पष्ट है कि नई पद्धति उस समय तक प्रचलित नहीं हो सकती थी जब तक कि ब्राह्मण उनका प्रचार न करते। साथ ही यदि ब्राह्मण उनके प्रचार से हाथ नहीं खींच लेते तो पुरानी पद्धति लुप्त नहीं हो सकती थी। इतिहास के विद्यार्थी को जो प्रश्न भ्रम में डालता है, वह है कि ब्राह्मणों ने नये पंथों की कल्पना क्यों की? प्राचीन आस्थाओं को तिलांजलि क्यों दे डाली? यह प्रश्न केवल जटिल ही नहीं है बल्कि विद्वानों को भ्रम में भी डाल देता है कि इस उथल-पुथल में इन्द्र जैसे देवताओं का भी लोप हो गया। इन्द्र एक वैदिक देवता है। वैदिक देवताओं में वह महानतम है। यदि हजारों साल तक भी नहीं तो सैकड़ों वर्षों तक ब्राह्मणों ने इन्द्र की परम देव के रूप में पूजा और स्तुति की। वह क्या वजह थी कि ब्राह्मणों ने इन्द्र की अवहेलना करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा आरंभ कर दी? ब्राह्मणों द्वारा आस्थाएं बदल देने का कारण आध्यात्मिक था अथवा व्यावसायिक?

शिव कौन थे जिन्हें इन्द्र के स्थान पर अपना लिया गया? दक्ष प्रजापति का यज्ञ और उसमें शिव की भूमिका शिव के विषय में महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है। कथा इस प्रकार है कि राजा दक्ष ने हिमालय पर कहीं एक यज्ञ किया। इस यज्ञ में देव, दानव, पिशाच, नाग, राक्षस और ऋषि सभी सम्मिलित हुए। परंतु दक्ष ने शिव को आमंत्रित नहीं किया, इसलिए वे नहीं आए। एक ऋषि दधीचि ने दक्ष की भर्त्सना की कि शिव को क्यों निमंत्रित नहीं किया और यज्ञ करना चाहते हो। दक्ष ने शिव को आमंत्रित करने से इंकार कर दिया और कहा ‘‘मैंने आपके रूद्र जैसे बहुत से देखें हैं आप जाइए मैं शिव को कुछ नहीं समझता’’। दधीचि ने कहा ‘‘तुमने शिव के विरुध षडयंत्र किया है, ध्यान रखना तुम्हारा यज्ञ सफल संपन्न नहीं होगा।’’ महादेव ने यह सुना तो अपने मुख से एक राक्षस उत्पन्न किया और राक्षस ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंश कर दिया। इससे पता चलता है कि एक समय ब्राह्मण शिव को पूज्य देवता नहीं मानते थे या इससे पता चलता है कि शिव ब्राह्मणों की यज्ञ प्रथा के विरुद्ध थे।